पृष्ठ:गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र.djvu/२२४

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......... विश्व की रचना और संहार। १८५ पृथ्वी और पानी का मेल होने पर उन चीजों से अंकुर निकलते हैं । अनेक प्रकार की येलें होती हैं, पन-पुष्प होते हैं, और अनेक प्रकार के स्वादिष्ट फल होते हैं। अण्डज, जरायुज, स्वेदज, उनिज सब का वीज पृथ्वी और पानी है। यही सृष्टि-रचना का अद्भुत चमत्कार है। इस प्रकार चारखानि, चार वाणी, चौरासी लाख* जीवयोनि, तीन लोक, पिंड, ब्रह्मांड लय निर्मित होते हैं" (दा. १३. ३. १०-१५)। परन्तु पञ्चीकरण से केवल जड़ पदार्थ अथवा जड़ शरीर ही उत्पन्न होते हैं। ध्यान रहे कि, जव इस जड़ देह का संयोग प्रथम सूदम इंद्रियों से और फिर आत्मा से अर्थात् पुरुषसे होता है, तभी इस जड़ देह से सचेतन प्राणी हो सकता है। यहाँ यह भी बतला देना चाहिये कि, उत्तर-वेदान्तग्रन्यों में वर्णित यह पञ्चीकरण प्राचीन उपनिपदों में नहीं है । छांदोग्योपनिएन में पाँच तन्मात्राएँ या पाच महाभूत नहीं माने गये हैं किन्तु कहा है कि, 'तेज, भाप (पानी) और अन्न (पृथ्वी)' इन्हीं तीन सूक्ष्म मूलतत्वों के मिश्रण से अर्थात् 'विपत्करण' से सव विविध सृष्टि बनी है । और, श्वेताश्वतरोनपट में कहा है कि, " अजामेकां लोहितशुरुकृष्णा यह बात रपट है कि चौरासी लाख योनियों की कल्पना पौराणिक है और यह अंदाज से की गई है। तथापि, वह निरी निराधार भी नहीं है। उत्क्रान्ति-दस्त के अनुसार पश्चिमी माधिभौतिक-शाली यह मानते हैं कि, सटि के आरंम में उपस्थित एक छोटे से गोल सजीव सूक्ष्म जन्तु से, मनुष्य माणी उत्पा हुआ । इस कल्पना में यह मात स्पष्ट है कि, सूक्ष्म गोल जन्तु का रशूल गोल गन्तु बनने में, इस स्यूल जन्तु का पुनम छोटा कीड़ा होने में, छोटे कीड़े के बाद उसका अन्य प्राणी होने में, प्रत्येक योनि अर्थात जाति की अनेक पीढ़ियाँ चौत गई होगी। इससे एक आंग्ल जीवशासश ने गणित के द्वारा मिरर फिया है कि, पानी में रहनेपाली छोटी छोटी मछलियों के गुण-धर्मा का विकास होते होते उन्हीं को मनुष्य-स्वरूप प्राप्त होने में, भिर भिन्न जातियों की लगभग ५३ लाख ७५ हजार पीढ़ियों बीत चुकी हैं। और, संभव है कि, इन पीढ़ियों की संख्या कदाचित इससे दस गुनी भी हो । ये दुई पानी में रहनेवाले जलनरों से ले कर मनुष्य तक को योनियों । अब यदि इनमें ही छोटे जल. चरों से पहले के सूक्ष्म जन्तुओं का समावेश कर दिया जाय, तो न माग कितने लाख पीलियों की कल्पना करनी होगी ! इससे मालग हो जायगा कि, हमारे पुराणों में वर्णित चौरासी लाख योनियों को कल्पना की अपेक्षा, आधिभौतिक शास्त्रों के पुराणों में वर्णित पीढ़ियों की कल्पना कहीं अधिक बढ़ी चढ़ी है । कल्पना-संधी यह न्याय काल (समय) को भी उपयुक्त हो सकता है । भूगर्मगन-जीव-शासशों का कथन है कि, इस बात का स्कूल दृष्टि से निश्चय नहीं किया जा सकता कि सजीव सृष्टि के सूक्ष्म जन्तु इस पृथ्वी पर कब उत्पन्न हुए; और सूक्ष्म जलनरों की उत्पत्ति तो कई करोड़ वर्षों के पाले हुई है। इस विषय का विवेचन The Last Link by Ernst Hacokol, with notas ato. hs 1r. H. Gadow (1898) नामक पुस्तक में किया गया है। टास्टर गेडो ने इस पुस्तक में जो दो तीन उपयोगी परिशिष्ट जोड़े हैं उनसे ही उपर्युक्त बातें ली गई है। हमारे पुराणों में चौरासी लाख योनियों की गिनती इस प्रकार की गई:-९ लाख जलचर, १० लास पक्षी, ११ लाख ऋमि, २० लाख पशु, ३० लाख सापर और ४ लाख मनुष्य (दासबोध २०.६ देखो)। गी.र. २४