पृष्ठ:गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र.djvu/१४

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प्रस्तावना। १५ कर्म-अकमविवेक अथवा नीतिशान पर नियम-बद्ध अन्य सब से पहले यूनानी तत्त्ववेत्ता अरिस्टाटल ने लिखा है। परन्तु हमारा मत है कि अरिस्टाटल से भी पहले, उसके पंथ की अपेक्षा अधिक व्यापक और तात्विक दृष्टि से, इन प्रश्नों का विचार महाभारत एवं गीता में हो चुका था; तथा अध्यात्मदृष्टि से गीता में जिस नीतितत्व का प्रतिपादन किया गया है उससे मिन कोई नीतितत्त्व अब तक नहीं निकला है । संन्यासियों के समान रह कर तत्वज्ञान के विचार में शान्ति से आयु चिताना अच्छा है, अथवा अनेक प्रकार की राजकीय उथला-पथल करना भला है-इस विषय का जो खुलासा अरिस्टाटल ने किया है वह गीता में है; और सागेटीज़ के इस मत का भी गीता में एक प्रकार से समावेश हो गया है कि मनुष्य जो कुछ पाप करता है, वह अज्ञान से ही करता है। क्योंकि गीता का तो यही सिद्धान्त है कि ब्रह्म- ज्ञान से घुद्धि सम हो जाने पर, फिर मनुष्य से कोई भी पाप हो नहीं सकता। एपिक्युरियन और स्टोइक पन्यों के यूनानी पण्डिसों का यह कथन भी गीता को प्राध है कि पूर्ण अवस्था में पहुंचे हुए शानी पुरुष का व्यवहार ही नीतिदृष्टया सब के लिये आदर्श के समान प्रमाण है; और इन पन्यवालों ने परम झनी पुरुष का जो वर्णन किया है वह नीता के स्थितप्रज्ञ अवस्थाचाले वर्णन के समान है । मिल, स्पेंसर और कोट प्रति आधिभौतिकवादियों का कथन है कि नीति की पराकाष्ठा अथवा कसौटी यही है कि प्रत्येक मनुष्य को सारी मानवजाति के हितार्थ उद्योग करना चाहिये; गीता में वर्णित स्थितप्रज्ञ के सर्वभूतहितेरताः' इस यात्य लक्षण में उपा कसौटी का भी समावेश हो गया है। कान्ट और प्रोन का, नीतिशास की उपप- तिविषयक तथा इच्छा-स्वातन्त्र्यसम्बन्धी सिद्धान्त भी, उपनिषदों के ज्ञान के अधार पर गीता में आ गया है। इसकी अपेक्षा यदि गीता में और कुछ अधिकता न होती, तो भी वह सर्वमान्य हो गई होती। परन्तु गीता इतने ही से सन्तुष्ट नहीं हुई; प्रत्युत उसने यह दिखलाया है कि मोक्ष, भक्ति और नीतिधर्म के वीच आधिभौतिक प्रन्य- कारों को जिस विरोध का आभास होता है, यह विरोध सबा नहीं है; एवं यह भी दिखलाया है कि ज्ञान और कर्म में संन्यासमागियों की समझ में जो विरोध जाडे आता है, यह भी ठीक नहीं है । उसने यह दिखलाया है कि ब्रह्मविद्या का और भक्ति का जो मूल तत्व है वही नीति का और सत्कर्म का भी आधार है; एवं इस बात का भी निर्णय कर दिया है कि ज्ञान, संन्यास, कर्म और भकि के समुचित मेल से, इस लोक में भायु बिताने के किस मार्ग को मनुष्य स्वीकार करे । इस प्रकार गीतामन्य प्रधानता से कर्मयोग का है, और लिये ब्रह्माविद्यान्तर्गत (कर्म) योगशास्त्र" इस नाम से समस्त वैदिक ग्रन्थों में उसे अग्रस्थान प्राप्त हो गया है । गीता के विषय में कहा जाता है कि " गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्र-