पृष्ठ:गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र.djvu/११२

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७५ आधिभौतिक सुखवाद । श्यकता है । इसी लिये हम देखते हैं कि उन पंडितों को भी कर्मयोगशास्त्र बहुत महस्य का मालूम होता है कि जो लोग पारलौकिक विषयों पर अनास्था रखते हैं या जिन लोगों का अव्यक्त अध्यात्मज्ञान में (अर्थात् परमेश्वर में भी) विश्वास नहीं है। ऐसे पंडितों ने, पश्चिमी देशों में, इस बात की बहुत चर्चा की है - और यह चर्चा अब तक जारी है-कि केवल आधिभौतिक शास्त्र की रीति से (अर्थात केवल सांसारिक दृश्य युक्तिवाद से ही) कर्म-कर्म-शास्त्र की उपपत्ति दिखलाई जा सकती है या नहीं। इस चर्चा से उन लोगों ने यह निश्चय किया है कि, नीतिशाय का विवचन करमे में अध्यात्मशास्त्र की मुव भी प्रावश्यकता नहीं है। किसी कर्म के भले या बुरे होने का निर्णय उस कर्म के बाद परिणामों से, जो प्रत्यक्ष देख पड़ते हैं, किया जाना चाहिये; और ऐसा ही किया भी जाता है । क्योंकि, मनुष्य जो जो कर्म करता है वह सब सुख के लिये या दुःख-निवारणार्थ ही किया करता है । और तो क्या सब मनुष्यों का सुख ऐहिक परमादेश है और यदि सब कर्मों का अंतिम दृश्य फल इस प्रकार निश्चित है तो नीति-निर्णय का सचा मार्ग यही होना चाहिये कि, सुख-प्राति या दुःख-निवारण के तारतम्य अर्थात् लघुता और गुरुता को देख कर सब कमी की नीतिमत्ता निश्चित की जावे । जबकि व्यवहार में किसी वस्तु का भला-बुरापन केवल बाहरी उपयोग ही से निश्चित किया जाता है, जैसे जो गाय छोटे साँगीवाली और सीधी हो कर भी अधिक दूध देती है वही अच्छी समझी जाती है, तब इसी प्रकार जिस कर्म से सुख-प्राप्ति या दुःख-निवारणात्मक वाय फल अधिक हो उसी को नीति की पुष्टि से भी श्रेयस्कर समझना चाहिये । जब हम लोगों को केवल वाय और एश्य परिणामों की लपुता-गुरुता देख कर नितिमत्ता के निर्णय करने की यह सरल और शास्त्रीय कसौटी प्राप्त हो गई है, तब उसके लिये यात्म-अनात्म के गहरे विचार-सागर में चार खाते रहने की कोई आवश्यकता नहीं है । " अर्क चेन्मधु विन्देत किमर्थं पर्वतं व्रजेत-पास ही में यदि मधु मिल जाय तो मधुमक्खी के छत्ते की खोज के लिये जंगल में क्या जाना चाहिये। किसी भी कर्म के केवल पाल फल को देख कर नीति और अनीति का निर्णय करनेवाले उक्त पत को हमने कहा है। क्योंकि, नीतिमत्ता का निर्णय करने के लिये, इस मत के अनुसार, जिन सुख-दुःखों का विचार किया जाता है ये सब प्रत्यक्ष दिखलानेवाले और केवल बाय अर्थात वाद्य पदार्थों का इंद्रियों के साथ संयोग होने पर उत्पन्न होनेवाले, यानी आधिभौतिक हैं । और, यह पंथ भी सब संसार का केवल आधिभौतिक पष्टि से विचार करनेवाले पंडितों से ही, चलाया गया है। इसका विस्तृत वर्णन इस ग्रन्य में करना असंभव है-भिल मिस ग्रन्थकारों के

  • कुछ लोग इस शोक में भी ' शब्द से ' आक या मदार के पेड़' का भी अर्थ

लेते है । परन्तु बासूत्र ३.४.३ के शांकरभाष्य की टीका में आनन्दगिरि ने अर्क शब्द का अर्थ समीप' किया है । इस लोक का दूसरा चरण यह है :- सिद्धस्यायस्य संप्राप्ती को विद्वान्यनमाचरेत् । 1 " आधिभौतिक सुखवाद