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ग़दर के पत्र

बता दिया करता था। यह बार-बार अंदर आता-जाता था,

और सब हाल कह देता था। लेफ़्टिनेंट ड्यूली साहब इसके बेहूदा रंग-ढंग से इतने तंग हो गए कि मजबूरन् हुक्म दे दिया था कि यदि यह फिर बाहर जाय, तो इसे गोली मार दी जाय।

लेफ़्टिनेंट रेज़ ने दूसरे अंगरेज़ों के साथ मैगज़ीन की रक्षा के लिये यथासंभव समस्त उपाय कर डाले। कंडक्टर निकल साहब ने जितनी तोपें थी, वे कम-से-कम चार दफ़ा सर कीं, और इस दृढ़ता और धैर्य के साथ कर्तव्य-पालन किया, मानो परेट पर काम कर रहे हों। यद्यपि विद्रोही ४०-५० गज़ के अंतर पर थे, और चारो तरफ़ से गोलियाँँ बरसा रहे थे। जब गोला-बारूद खत्म हो गया, उस समय कंडक्टर के कोहनी से ज़रा ऊपर एक गोली आकर लगी, जो बाद में निकाल ली गई। इसके बाद दो गोलियाँ मेरे भी लगीं। इस लड़ाई और धावे के बाद लेफ़्टिनेंट ड्यूली ने मेगज़ीन को उड़ा देने की आज्ञा दी, जिसकी तामील कंडक्टर निकल साहब ने फ़ौरन् की। तमाम शतावों में आग लगा दी। यद्यपि कोई ऐसा आदमी न था, जिसे कुछ-न-कुछ चोट न लगी हो, परंतु जान से बच गए। और, उन रास्तों से, जो मेगज़ीन के उड़ने से दीवारों में बन गए थे, जमना की ओर बाहर आ गए। लेफ्टिनेंट ड्यूली और मैं जान सलामत लेकर कश्मीरी दरवाज़े तक पहुंच गए। मैं नहीं कह सकता कि औरों के साथ क्या हुआ। लेफ़्टिनेंट रेज़ साहब और कंडक्टर एकली साहब