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उमा

उसके सौन्दर्य की कल्पना की थी; किन्तु पहले उसमें ऐसी आकर्षणी शक्ति नहीं थी। पहले उनको उमा के सौन्दर्य में रहस्यमय कठोरता दिखाई देती थी; किन्तु आज वह माधुर्य की जीती-जागती तस्वीर थी।

उमा ने मुस्करा कर पूछा—इतने दिनों तक आये क्यों नहीं?

"अवकाश नहीं मिलता था।"

"बातें न बनाओ। यह क्यों नहीं कहते कि जी नहीं चाहता था?"

रतन—(झेंपकर) नहीं, यह बात नहीं थी।

"फिर क्या आपको इतना समय नहीं मिल सकता कि यहाँ आ सकते? अवकाश तो कोई ऐसी चीज़ नहीं कि न मिल सके।"

रतन—(विषय पलटने के निमित्त) आज बिहारी भाई कहाँ हैं? दिखाई नहीं देते।

"एक दावत में गये हैं।"

इतने में नौकर ने आकर कहा—खाना तैयार है।

दोनों खाने के कमरे में चले गये। खाना मेज पर लगा दिया गया।

"शुरू कीजिए।"

"आप भी आयँ।"

“यह तो नियम के विरुद्ध है। पहले मेहमान की खातिर होनी चाहिए।"

"लेकिन यह भी तो नियम के विरुद्ध है कि मेहमान अकेला छोड़ दिया जाय ।"