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गल्प-समुच्चय

भेजा हुआ निमन्त्रण—जाना चाहिए, सिर-आँखों के बल जाना चाहिए। रतन ने जाना ही निश्चित् किया। उनकी दशा उस बालक की-सी थी, जो माँ से वादा करता है कि अब किसी चीज़ के लिए जिद न करूँगा; लेकिन मिठाईवाले की आवाज़ सुनते ही फिर मचल जाता है!

उमा का सुसज्जित ड्राइंग-रूम विद्युत-प्रकाश से जगमगा रहा था। वह एक कोच पर पड़ी हुई एक पुस्तक पढ़ने का प्रयत्न कर रही थी; किन्तु पढ़ने में जी नहीं लगता था। प्रतीक्षा में चित्त की एकाग्रता कब प्राप्त होती है? उसके नेत्र बार-बार द्वार की ओर देखते, निराश होकर लौटते और फिर देखते, कान किसी के पैर की आहट पाने के लिए आतुर थे। इतने में नौकर ने रतनकुमार के आने की सूचना दी।

उमा ने बढ़कर मधुर मुस्कान से रतन का स्वागत किया, जैसे अरुणोदय के समय उषा की सौन्दर्य-माधुरी उद्यान के फाटक पर एकान्त-सेवी दर्शक का स्वागत करती है। रतन मन्त्रमुग्ध से हो गये। उमा के शृङ्गार और सौन्दर्य ने उनके साथ वह काम किया जो वाटिका की अनुपम छवि दर्शक के साथ करती है। पूर्व की स्मृतियाँ, बाल्यकाल के सुखद स्वप्न, हृदय की सुप्त आशायें जाग पड़ीं, मानो कवि के मस्तक में विश्राम करती हुई कल्पना बाल सूर्य की शीतल रश्मियों से, वसन्ती समीर के मन्द झकोंरो से, सुगन्ध की लपटों से जाग गई हो! रतन ने उमा को। कितनी ही बार देखा था, रात्रि की अन्धकारमय नीरवता में कितनी ही बार