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मुस्कान

सम्मुख विवृत हो चुका था और उसने पिता की पुण्यमयी शिक्षा के पावन प्रभाव से यह जान लिया था कि इस वैधव्य के दुःखमय जीवन की पवित्र एवं अवाध मृदुल गति से व्यतीत करने का एक मात्र उपाय निःस्वार्थ सेवामयी साधना है। गुणसुन्दरी सदा, निर्विकार हृदय से, निस्वार्थ बुद्धि से एवं निष्काम कामना से इसी साधना के अनुष्टान में तन्मयी होकर रत रहती।

सेवा और साधना-दोनों सहोदरा हैं और उनकी जननी है पुण्य-प्रवृत्ति।

(३)

श्रावण-शुक्ला-त्रयोदशी के प्रातःकाल शुभ ब्राह्म-मुहूर्त में सुशीला ने पुत्र-रत्न प्रसव किया। सत्येन्द्र एवं सुशीला के आनन्द की बात जाने दीजिये, उनके सारा घर-का-घर आनन्द की मन्दाकिनी से साबित होने लगा। गुणसुन्दरी अपनी माता के घर ही से एक सुवर्ण की कण्ठमाला बनवा लाई थी जिसमें मध्यमणि के स्थान पर एक सुवर्ण मण्डित रुद्राक्ष था। उसने अपने पवित्र आशीर्वाद के साथ उसे नवजात शिशु के गले में रक्षा कवच के रूप में पहना दिया। उस दिन सत्येन्द्र और सुशीला ने देखा कि गुणसुन्दरी के मुख पर एक अपूर्व उल्लास है, एक परम पवित्र तेज है। उस दिन गुणसुन्दरी का गम्भीर प्रशान्त हृदय-सागर भी चन्द्र-दर्शन को पाकर आनन्दातिरेक से उद्वेलित होने लगा।

गुणसुन्दरी स्वभावतः ही गम्भीर प्रकृति की थी। रस-रंग, हास, परिहास पर उसका विशेष अनुराग नहीं था; पर सुशीला के