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गल्प-समुच्चय


देखकर सौतिया डाह का बुखार निकाल रही थी। तातारी बाँदी को देखकर बादशाह ने आग होकर कहा––"क्या लाई है?"

बाँदी ने दस्तबस्ता अर्ज की––"खुदाबंद! सलीमा बीबी की अर्ज़ी है।"

इतना कहकर उसने सामने ख़ता रख दिया।

बादशाह ने गुस्से से होंठ चबाकर कहा––"उससे कह दे कि मरजाय।" इसके बाद ख़त में एक ठोकर मारकर उन्होंने उधर से मुँह फेर लिया।

बाँदी लौट आई। बादशाह का जवाब सुनकर सलीमा धरती पर बैठ गई। उसने बाँदी को बाहर जाने का हुक्म दिया, और दरवाज़ा बन्द करके फूट-फूट कर रोई घंटों बीत गए, दिन छिपने लगा। सलीमा ने कहा––"हाय! बादशाहों की बेगम होना भी क्या बदनसीबी है! इन्तज़ारी करते-करते आँख फूट जाये, मिन्नतें करते-करते ज़बान घिस जाय, अदब करते-करते जिस्म टुकड़े-टुकड़े हो जाय, फिर भी इतनी-सी बात पर कि मैं जरा सो गई, उनके आने पर जाग न सकी, इतनी सजा? इतनी बेइज्ज़ती?

तब मैं बेगम क्या हुई? जीनत और बाँदियाँ सुनेंगी, तो क्या कहेंगी? इस बेइज्ज़ती के बाद मुँह दिखाने लायक कहाँ रही? अब तो मरना ही ठीक है। अफसोस! मैं किसी ग़रीब किसान की औरत क्यों न हुई!"

धीरे-धीरे स्त्रीत्व का तेज उसकी आत्मा में उदय हुआ। गर्व