पृष्ठ:गर्भ-रण्डा-रहस्य.djvu/८७

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गर्भ-रण्डा रहस्य। (२७१) मार मार कर व्यग्र, नाकनायक * कर डाले। चक्र, त्रिशूल, कृपाण, गदा, पट्टिश, इषु, भाले॥ भट वृन्दारकवृन्द, विकट बादल से फाड़े। वज्र-विलास बगार, इन्द्र ने पटक पछाड़े। (२७२) यो प्रचण्ड रण रोप, लड़े सब देव लड़ाके। निरखे शस्त्र-प्रहार, सुने घन-घोर धड़ाके ॥ वीर लगे बल-दर्प, दिखाने अपना अपना। खुल गई मेरी आँख, होगया सपना सपना ॥ (२७३) रात बिताकर पिण्ड, अशुभ सपने से छूटा। चढ़ते ही दिन और, कष्ट सिर पर यों टूटा ॥ करने लगी विलाप, विकल मेरी महतारी। घोर अमङ्गल नाद, सुना उपजा भय भारी॥ (२७४) मजन करना छोड़, उतर आँगन में आई। मा की कुगति विलोक, शोक-वश मैं घबराई । सुन्दर भूषण, वस्त्र, समस्त उतार दिये थे। चुड़ियाँ फोड़, मलीन, फटे पट धार लिये थे।