पृष्ठ:गर्भ-रण्डा-रहस्य.djvu/७९

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5 गर्भ-रएडा-रहस्य। (२३६) ठग, चिकित्सकाभास, निरंकुश चरने वाले। दुखियों को फुसलाय, प्राण,धन हरने वाले ॥ ऐसे उजबक झाड़, कुगति की झेल रहे थे। पिटते थे चुपचाप, जान पर खेल रहे थे। (२४०) जो खल घुस पचाय, पले थे मदिरा, पल से । वे कर पान अपेय, पेट भरते थे मल से॥ दाम जिन्हें अभियोग, अलीक दिया करते थे। घेर उन्हें यमदूत, मूत मुख में भरते थे। (२४१) जो कुल-कण्टक पेट, परामिष से भरते थे। नोच नोच कर गीध, उन्हें घायल करते थे। जो जड़ मादक द्रव्य, विना व्याकुल रहते थे। । वे जगदुन्नति-शत्रु, तीव्र ताड़न सहते थे। (२४२) जो जड़धी अपमान, ब्रह्मकुल का करते थे। खल-मण्डल के पोप, विप्रतनया वरते थे। शुद्ध सुहृद को दान, सुनीति न दे सकते थे। छी! छी!!चिरकनचाट, मैल-मल वे भकते थे।

  • मांस ।