पृष्ठ:गर्भ-रण्डा-रहस्य.djvu/४५

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३४ गर्भरण्डा-रहस्य । (१२७) दिनभर गाये गीत, परम आनन्द मनाया। घर घर भाजी बाँट, लोक-व्यवहार बनाया। बरसी धन की धूलि, नेगियों पर बहुतेरी। बोली निकट विठाय, मुझे निधड़क मा मेरी ॥ अब तो तू शुभ कर्म, धर्म अपनाय चुकी है। श्रीगुरु-मुख से मन्त्र,-महाफल पाय चुकी है। यद्यपि उलटा काम, कदापि न होगा तुझ से। जाति-नीति, कुलरीति, समझले तो भी मुझ से। (१२६) गिरिधर, गोपीनाथ, गोप-गुरु, गोकुलवासी। राधिकेश, रसिकेश, रमापति, रासविलासी॥ मोहन, माखन-चोर, मदत, मुकुन्द, मुरारी। केशव, कृष्ण, कृपालु, कहा कर कमला प्यारी॥ ( १३०) मन में हरि का ध्यान, प्रीति प्रतिमा-पूजन में। रसना रहै निमग्न, कृष्ण के कर्म कथन में ॥ अवतारों पर रूप, भेद का भार न धरना। सब को मान समान, भक्ति से दर्शन करना॥