पृष्ठ:गर्भ-रण्डा-रहस्य.djvu/४३

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३२ गर्भ-रएडा-रहस्य। (१२१) जननी ने गुरु देव, निमन्त्रण भेज बुलाये। सेवक वृन्द समेत, पालकी पर प्रभु आये ॥ कर स्वागत सत्कार, उतारे हरि-मन्दिर में। पधराये बिछवाय, सजीला मञ्च अजिर में । (१२२) दर्शन को तज काम, धाम दर्शक उठ धाये। जीवन का फल पाय, मनोरथ सिद्ध कहाये ॥ मैं छक रही निहार, मदनमोहन की झांकी। मन में अटकी आय, चुटीली चितवन बाँकी ॥ (१२३) मुझ को भीड़ हटाय, निकट लेगई लुगाई। सरस रूप-लावण्य, निरखने लगे गुसाई ॥ धुलवाये पद-पद्म, परमहित मेरा सोचा। अंगुली पर अंगुष्ठ, उटा कर दिया दबोचा ॥ (१२४) पुष्ट प्रमाण सुनाय, स्वमत का मर्म जताया। हँस कर कंठी बाँध, मनोहर मंत्र वताया ॥ उगल पान की पीक, चटा कर चेली करली। चरणों पै चढ़वाय, भेंट गोलक में भरली ॥ I