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गर्भ-रण्डा-रहस्य।

(२७)


वर का लिङ्ग शरीर, बँधा है इस पुड़िया में।
वरनी का प्रतिबिम्ब, दरसता है गुड़िया में॥
गुड़िया का कर वाम, पड़ी पुड़िया पै धरदो।
झटपट कन्यादान, लग्न के भीतर करदो॥

(२८)


जननी ने झुँझलाय, कहा यह आडम्बर है।
किस का रचा विवाह, न कन्या और न वर है॥
कुक्कुर से तुम तीन, अनर्गल भोंक रहे हो।
अँखियों में धिक्‌धूलि, कुमति की झोंक रहे हो॥

(२९)


ठग ने किया विचार, अभी कुछ और कहेगी।
बरजूँ दर्प दिखाय, नहीं तो चुप न रहेगी॥
गरजा सिंह समान, घुड़कने लगा घमण्डी।
बस आगे बकवाद, न करना चञ्चल चण्डी॥

(३०)


ठगिया लंठ लवार, समझती है तू मुझ को।
ठगनी देकर शाप, भस्म करदूँगा तुझ को॥
ब्रह्म-तेज-बलसे न, पलक-पिट्टो डरती है।
बरद बड़ों में दोष, निरख निन्दा करती है।