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खूनी औरत का


है कि मुझे जब चाहें, तब मजिस्टर साहब के सामने पेश करें; पर रही रसोई खाने की मात,-सो,साहब ! मैं रसोई-फसोई नहीं खाने की। अरे, रसोई तो क्या, मैं तो बाजार की पूरी, कचौरी और मिठाई भी नहीं खा सकती।"

यह सुन और खूब जोर से हंस कर दरोगाजी ने कहा,-- "अक्खा! तुम तो खासी ' बाजपेइन' मालूम देती हो ! अजी थी ! जो तुम इतनी परहेजदार थीं, तो फिर तुमने यहां तक आगे की तकलीफ ही क्यों उठाई ?”

उन महाशय की ऐसी बेढंगी यातें सुन कर मैं कुढ़ गई और मैने उनसे यों कहा-"सुनिए, साहव ! मैं आपके साथ व्यर्थ यघाद करना नहीं चाहती। सो, यदि आपको मुझे कुछ खाने बाने को देना हो तो बिना मीठे का सेर भर कच्चा दूध मंगवा दें; और जो ग देना हो तो वैसा कहें, क्योंकि मैं इस जगह रह कर सिवा दूध के, और कुछ भी खाने की चीज नहीं छऊंगी।"

मेरी बात सुन और ताले में से ताली निकाल कर वे तो भुनभुनाते हुए चले गए और मैने शिवराम तिवारी से पूछा,- "क्या येही दरोगाजी हैं ?

इस पर उसने-"हां"-कह कर यों कहा,-" दुलारी! तो करा तुम सिवा दूध के, और कुछ भी न खाओ-पीओगी ?"

मैं बोली,--" नहीं, भाई ! अब, जब तक मैं इस आफत से छुटकारा न पाऊंगी, तब तक सिवा दूध के, दूसरी कोई भी चीज नहीं खाऊंगी। हां, पानी के लिये लाचारी है।"

इस पर उसने कहा,--"लेकिन दूध का मिलना तो कठिन है!"

मैं बोली,--"अच्छा, खाली पानी तो मिलेगा ?"

यह कहने लगा,--"भला, सिर्फ पानी पी कर कै दिन तक रह सकोगी ?"

मैं बोली,--"जब तक दम में दग है, तब तक मैं केवल