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सात खून।



तीसरा परिच्छेद।
अयाचित बन्धु।

"इत्मचे व्यसने चैव दुर्भिक्षे राष्ट्रविप्लवे।
राजद्वारे स्मशाने च यास्तष्ठति स बान्धवः॥"

(चाणक्यः)

अस्तु, अब यह सुनिए कि कुर्सियों पर बैठ जाने पर उन नौजवान बैरिष्टर साहब ने मुझे सिर से पैर तक फिर अच्छी तरह निरख कर यों कहा,—"दुलारी तुम्हारा ही नाम है?"

मैने धीरे से कहा,—"जी हां।"

वे बोले,—"अच्छा तो, और कुछ पूछने के पहिले मैं अपना और अपने साथी का कुछ थोड़ासा परिचय तुम्हें देदेना उचित समझता हूं। यद्यपि हमलोगों का कुछ थोड़ासा परिचय जेलर साहब तुमको दे भी गए है, पर तौ भी मैं अपने ढंग पर अपना और अपने साथी का कुछ परिचय देदेना ठीक समझता हूं। सुनो, ये मेरे साथी सरकारी जासूस हैं। ये जब बीस बरस के थे। तभी सरकारी जासूसी मोहकमे में भर्ती हुए थे, जिस बात को आज चालीस बरस हुए। अर्थात मेरे साथी की उम्र इस समय साठ बरस की है और ये बत्तीस बरस तक सरकारी नौकरी करके बड़ी नेकनामी के साथ पेन्शन लेकर अब अपने घर रहते हैं। इनका नाम भाई दयालसिहंजी है, ये पंजाबी सिक्ख हैं और इन्हें सरकार ने 'रायबहादुर' की पदवी से भी सम्मानित किया है। इनके चार लडके हैं, और वे चारों युक्तप्रदेश के भिन्न भिन्न जिलों में डिप्टी कलक्टरी के पद पर सुशोभित हैं। इनके सबसे छोटे लड़के भाई निहालसिंह से, जो आजकल प्रयाग के डिप्टी कलक्टर हैं, मेरी बड़ी गहरी दोस्ती है और उन्हीं की बड़ी कृपा और प्रेरणा से उनके ये बूढ़े पिता भाई दयालसिंहजी इस बुढ़ौती की उम्र में

 

(२) टुंडा