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खूनी औरत का सात


जब तक आप खुद कोई हुकुम न देंगे, तब तक मैं किसी दूसरे के कहने से कुछ भी न करूंगी।"

मेरी बात सुनकर साहब जरा सा मुस्कुराए और कहने लगे,- "अच्छा बाट है । हम हुकुम डेटा है, टुम अपना बयान बालो।"

मैं बोली,--" बहुत अच्छा, सुनिए--"

यों कहकर जो कुछ सच्ची बात थी, उसे मैं कहती गई और कोतवाल साहब झर झट लिखते गए।

बस, यहांतक कहकर मैंने उन साहप बहादुर की ओर देखकर यो कहा, जो भाई दयालसिंहजी के बीच में बैठे हुए मेग बयाम लिख रहे थे,--"कों,साहब! क्या मैं उस कहानी को फिर दुहराऊं, जिसे कि मैने अभी ऊपर सिलसिलेवार बयान किया है ? "

यह सुनकर साहब ने कहा,--भई, अब डुबारा उस बाट के कहने का कोई जरूरट गई है। टुम खूय ठीक टरह से अपना बयान बोला । बस, इसी टौर से बराबर मालना ठीक होगा। चलो, आगे बोलो ।

इसपर--"बहुत अच्छा"-कहकर मैने यों कहा,--

बस, जब मेरा सारा बयान लिखा जा चुका, तब यहां पर के छओं चौकीदारों का बयान लिया और लिखा गया। इन चौकीदारों का ध्यान मैने भी सुना था और उसके सुनने से मुझे बड़ा आश्चर्य इस बात का हुआ था कि दियामतहुसेन और रामदयाल सरीखे भले आदमियों में भी हलफ लेकर न जाने क्यों, बहुत कुछ झूठा ही बयान लिखवाया !!! पर ऐसा उन्होंने क्यों किया, इसे मैं इस समय तो नहीं समझी, पर पीछे समझ गई थी।

उन सभी ने अपने बयान में जो कुछ कहा था, उसका खुलासा मतलब यही है कि,--"यह औरत एक बैलगाड़ी पर चढ़कर यहां आई थी, पर इसके साथ थानेदार अबदुल्ला की क्या का बातें हुई, उन्हें हमलोग नहीं जानते। हां, इसमा हमलोग जानते हैं कि इस