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खूनी औरत का


यह सुनकर मैने फिर उसके मुहं में पानी डाला, पर अबकी बेर वह उसके गले के नीचे न उतरा और बाहर निकल कर बह गया। इतने ही में कालू ने दो-खार चार हाथ-पैर हिलाए, कई हिचकियां ली और दम तोड़ दिया !!!

यह लख कर फिर मैं उस कोठरी में तनिक भो म ठहरी और बाहर निकल आई।

मेरे पैर खून से रंग गए थे, इसलिए पहिले तो मैने पैरों को खूब धोया, इसके बाद इस बात पर भली भांति विचार किया कि, 'अब मुझे क्या करना चाहिए।'

बहुत कुछ सोच-विचार करने के बाद मैने यही निश्चय किया फि, 'यहांसे भागकर मैं कहां जाऊंगी और किस जगह छिप कर रहूंगी, क्योकि मुझे कौन सरग देगा! इसके अलावे, भागने पर इन पांच-पांच खूनों की अपराधिमी मुझे ही धनना पड़ेगा। इसलिये अब मुझे यही करना चाहिए कि सारी लाज-शरम छोड़फर मैं स्वयं थाने पर चलूं और इन हत्यामों की रिपोर्ट लिखवाऊं। इसमें फिर जो कुछ भी हो, पर मुझे ऐसे अवसर पर न तो काही भागमः ही चाहिए और न छिप कर बैठ ही रहना चाहिए।'

बस, यह सोच कर मैं तुरन्त अपने घर से बाहर हुई और अपने गांव से तीन-चार फोस दूर एक दूसरे गांष के थाने पर जाने का मैंने पक्का इरादा कर लिया। क्योकि मेरे गांघ पर जो थामा हा दिवाली पर आग लग जागे से बह जल गया था और उसके लिये दुसरा झोंपड़ा अभी नहीं आना था। इसलिये इस गांध पर की चाल की रिपोर्ट पास के उप्तो दूसरे गांघ पर खिलाई जाती थी। वह उसी गांव पर जाने का मैने निश्चय किया।