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खूनी औरत का


यह कहने लगा,--"तुम्हारी इस बात का क्या मतलब है ?

मैं बोली,--"मतलब तो बिलकुल साफ ही साफ है । अर्थात मैं केवल तुमको चाहती है,इसलिये वक्त तुम्हारी ही होकर रहना भी पसन्द करती हूं। सो, यदि तुम भी मुझे सचे जी से प्यार करते होचो, तो मुझे तुम अपनी जोरू को तरह रक्खरे, पंचायती रण्डी की भांति न रक्खो, क्योंकि मैं एक तुम्हारी ही होकर तो रह सफंगी, पर तुम्हारे उन तीन तोन यारों की टहल-आखरी मुझसे कभी भी नहीं होने की।"

मेरी ऐसी विचित्र बात को सुनकर वह मूरख उछल पड़ा और बोला,-" हाय, प्यारी दुलारी ! तो तुम से अबतक यह अपने जी की बात सुनकर क्यों नहीं जाहिर की थी ! अच्छा, कुछ पर्वा नहीं, तुम्हारा सारा मतलब मैं अच्च भली भांति. समझ गया। गव तुम जरा न घबराओ, क्योंकि अब तुमको सिर्फ मेरी घरवाली बनने के अलावे और किसी गैर साले की परछाई भी नहीं छूनी पड़ेगी। बस, अब तुम कोई फिकर न करी और थोड़ी देर तक योगी पड़ी रही । मैं अभी लौरफर माता हूँ गौर तुम्हें यहांसे निकाल कर चलता हूँ।"

यों कहकर कालू उठा और उस कोठरी के बाहर जाने लगा। यह देखकर मैंने उससे पूछा,-"तुम अब भले कहां?"

यह कहने लगा,--"मैं इन तीनों को विदा करने जाता है।

यह सुनकर मैंने बड़े अचरज के साथ उससे पूछा,-"ऐं, यह तुम क्या कहते हो ? क्या घे तीनों तुम्हारे कहने से मुझे तुम्हारे होप में सौंप कर यहांले चुपचाप चले जायंगे?"

वह कहने लगा,--"उन सालों के सात पुरखे जायंगे,फिर भला उनकी तो बिसात ही क्या है ! "

यह कहकर वह अपनी तल्वार लिये हुए जब उस कोठरी के बाहर जाने लगा, तो मैने फिर कहा,-" मेरे हाथ-पैर के बन्धन