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सात खून।


नवां परिच्छेद।

प्रलोभन ।

"महामायासमा नारी महामायामयी स्मृता।
गच्छन्ति केऽस्या मायाया: पारं भुवि नरा मुमे ॥"

(देवोभागयते)
 

रस इशारे को समझकर कालू तुरन्त मेरी खाट के पास आकर बैठ गया और घाला,--"कहो, क्या कहती हो?"

मैने पूछा,--" यह सब क्या हो रहा है और तुम-सब यहाँ पर क्यों इकट्ठे होरहे हो?"

मेरी बात सुनकर कालू कहने लगा,--" दुलारी, यह सब जो कुछ तुम देख रही हो, उसका असली समय तुम्हारी अनूठी सुन्दरता ही है। सुनो दुलारी, तीन-चार बरस से इस गांव भर में तुम्हारे अनोखे रूप की धूम सी मच गई है और यहां के बहुत से आदमी तुम पर मरने लगे हैं। यों तो इस गांव के सैकड़ों आदमी तुम्हारे रूप पर जान दिए बैठे हैं, पर उनमें से हम-सब बारह समे ऐसे तुम पर लट्ट हुए हैं कि हमलोगों से मिलकर एक गोठ (गोष्ठो-समा) बनाई है और उसमें नित्य हमलोग इकटु होते और तुम्हारे रूप का बखान कर कर के अपने अपने जी को पहलाते । उन बारह आदमियों के नाम ये हैं, जिन्हें तुम जरूर ही जानती होगी। नब्बू जुलाहा, २धाना फोहरी,३ परसा कहार, मैं कालू कुर्मी, ५ यह मरा हुआ विरथा माऊ, ६ घोसू नियां, बहादुर दधे, ८ तिनकौड़ो कांदू, हेमू भड़भूमा. १. पतलू महाबाहन, ११ रासू चमार और १२ लालू हलवाइ। यों को इस गांव के सैकड़ों आदमी तुमपर जी जान से निछाबर होरहे हैं, पर हम बारह जगं धारे घीरे आपस में मिले और हम अपनी एक जमात कायम की। फिर लाल हलवाई को सौपाई (बैठक ) में हमलोग रोज रात को