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खूनी औरत का


सातवां परिच्छेद।

हितोपदेश ।

"माता मित्रं पिता चेति स्वभाषात्त्रितयं हितम् ।
मातुः पितुः परं मित्रं यद्वधः परमं हितम् ॥"

(हितोपदेश)
 

यों बहकर भाईजी किर मुझसे बोले,--"दुलारी, अब तुम अपना बयान मेरे आगे कह जागा; पर इतना तुम ध्यान रखना खि इस समय जो कुछ तुम कहो, उसे खूब अच्छी तरह सोच-समझ पर कहना।"

यो कहकर भाईजी ने अपने जेब में से एक मोटी सी पोथी निकाली, जो सादे कागजों की थी । बस, इस पुस्तक को एफ हाथ में ले और दूसरे हाग्र से स्याही से भरी हुई कलम पकड़कर उन्होंने मेरी ओर देखा।

मैंने धीरे से कहा,--"आपमे जो मुझे बार बार यह चेतावनी दी कि,'मैं जो कुछ इस समय आप के आगे यांन करू, वह सब सच ही कहूँ, झूठ न कहूँ।' क्यों, आपके इस फहने का यही मतलब है न ?”

भाईजी ने कहा,--"नहीं, मेरा मतलब यह नहीं हैं; अर्थात् मैं तुम्हें झूठी नहीं समझता, और न यही सवाल करता हूं कि तुमने अबतक अपने जितने बयान दिए हैं, उनमें कुछ भी झूठ कहा गया है। मेरे कहने का मतलब केवल यही है कि इस समय तुम मी चित्त को सूय अच्छी तरह सावधान करके जो कुछ लिखवाओगी, उसके साथ मैं तुम्हारे पहिले के दिए हुए बयानों को मिलाऊंगा और तय इस बात की कोशिश कर सकूंगा कि तुम्हारे छुटकारे के लिये कौन सा " पाइन्ट " अच्छा है, जिसे पकड़ कर हाईकोर्ट के जजों के आगे बहस की जाय।"