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खूनी औरत का


चौथा परिच्छेद।

नई कोठरी।

"नमस्यामो देवान् ननु हत विधेस्तेपि वशगा,
विधिर्वन्द्यः सोऽपि प्रतिनियतकमैक फलदः।
फलं कर्मायत्त यदि किगमरै: सि विधिना,
नमस्तत्कर्मभ्यो विधिरपि न येभ्यः प्रभवति ॥"

(भत्त हरिः)
 

बस, इसी तरह की बातें मैं मन ही मन सोच रही और रो रही थी कि इतने ही में जेलर साहब ने आकर मुझसे यों कहा,-- बेटी दुलारी, मुझे ऐसा जान पड़ता है कि तुम्हारे खोटे दिन गए और भले दिन अब आया ही चाहते हैं। तुम पर जगदीश्वर की करुण दृष्टि पड़ी है और तुम्हारा दुर्भाग्य सौभाग्य से बदला चाहता है । मेरे इतना कहने का मतलब केवल यही है कि एक बड़े जबर्दस्त हाथ ने तुम्हें अपने साय तले लेलिया है, जिससे इस आफ़त से तुम्हारा बहुत जल्द छुटकारा हो जाय तो कोई आश्चर्य की बात नहीं । बात यह है कि भाई दयालसिंह बहुत पुराने और बड़े जबर्दस्त जासूम हैं और सरकार के यहां इनके बातो का बड़ा आदर है। तब, जब कि यही दयालसिंह तुम्हें छुड़ाने के लिये उठ खड़े हुए हैं तो मैं निश्चय कह सकता हूँ कि तुम्हारा छुटकारा जरूर ही होजायगा । और यदि ईश्वर ने ऐसा किया तो मैं सचमुच बहुत ही प्रसन्न होऊंगा । क्योंकि मैं भी बालबच्चे वाला हूं और यह बात जी से चाहता हूँ कि किसी तरह तुम इस बला से बच जाओ।

मैं चुपचाप जेलर साहब को बातें सुनती रही, इतने में फिर वे यों कहने लगे,--" देखो, भाई दयालसिंह की बढ़ी चढ़ी ताकत का एक नया तमाशा तुम देखो। मुझे अभी मजिष्ट्रर साहब का एक तूक्मनामा मिला है, जिसमें यों लिखा है कि, दुलारी कालकोठरी