पृष्ठ:खूनी औरत का सात ख़ून.djvu/१४१

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सात खून।


का जिक्र इज़हारों की मिसिल में दर्ज होना रह गया, जिसका फायदा मुझे होना चाहिये।"

मेरी इस बात को सुन और कुछ देर तक चुप रहकर हाकिम ने मुझले यों कहा,--" खैर, तुमको और क्या कहना है ?"

मैंने कहा--हुजूर, ज़रा इस बात पर गौर तो किया जाय कि जिन कालू वगैरह हथियारबन्द लुटेरों ने मेरा सारा घर लूट लिया, उन्हें भला मैं अकेली क्योंकर मार सकती थी ?"

हाकिम,--"चालाक औरती ने अक्सर धोखा देकर खून कर डाले हैं, क्योंकि इज्जत-आबरू के बचाने का एक ऐसा ख़याल औरतों में हुआ करता है कि जिस ( खयाल ) की वजह से वे (औरते ) भारी भारी काम कर डालने की ताकत पा जाती हैं।

यह सुनकर मैं बोली,--“अच्छा, इस बात पर तो ध्यान दिया जाय कि अपने घर में हुए उन पांच-पांच खूनों की इत्तला करने के वास्ते में खुद रसूलपुर के थाने पर गई थी। अब यहां पर यह सोचने की बात है कि अगर मैं ही खूनी होती तो खून की इत्तला करने जाती, या अपनी जान बचाने के लिये कहीं भाग जाती ?"

हाकिम,--"अक्सर चालाक और दिलेर खूनी अपने कसूर को किसी और पर मढ़ देने की गरज से अपने किये हुए खून की इत्तला करने खुद थाने पर पहुंच जाया करते हैं । मगर जब उन की सारी कारस्तानी का भंडा फूट जाना है तो वे अख़ीर में लाचार होकर अपने कसुर को अदालत के सामने कबूल करते और सज़ा पाते हैं । बस, अगर तुम भी कहीं भाग गई होती, तो फौरन या देर में जरूर ही पकड़ी जातीं और सजा पातीं। तुमको यह बात अच्छी तरह जान लेनी चाहिए, कि गवर्नमेंट की अमलदारी में कसूर करके कोई भी मुजरिम ज़ियादह दिन तक लुकछिप कर अपने तई हर्गिज नहीं बचा सकता । बस, एक न एक दिन वह ज़रूर ही पकड़ा जाता