पृष्ठ:खूनी औरत का सात ख़ून.djvu/१२८

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खूनी औरत का


खुद लिख लिया था। उस इजहार की नकल यह है,—

हजरत कोतवाल साहब उस कागज को अपनी आंख के आगे करके यों पढ़ने लगे,—

"मेरा नाम दुलारी है। मेरे बाप का नाम विश्वनाथ तिवारी था। मेरा मकान 'दौलतपुर, नाम्न के गांव में है। मेरी उम्र इस समय पंद्रह या सोलह बरस के लगभग होगी। मैं अभी तक क्वारी हूँ। आज कई दिन का अरसा हुआ कि मेरे बाप पलेग ले मर गए। इसके कुछ ही दिन पहिले मेरी मां मर चुकी थीं। सो, मेरे बाप जब मरे, तब उस गांव का कोई भी उन्हें उठाने नहीं आया था, क्योंकि सारे गांव में पलेग फूट निकला था। इसलिये मेरे बाप के मरने पर उनके उठाने के लिये जब गांववालों में से कोई भी न आया, तब मेरे यहां जो चार हरवाहे नौकर थे, वे ही मेरे बाप को उठा कर ले गए। यह देख कर मैं भी उन सभों के पीछे-पोछे दौड़ी गई। पर जब मैं गंगा किनारे पहुंची, तो मैने का देखा कि वे चारों गांव की ओर लौट रहे हैं! यह देख कर जब मैंने उन सभों से यों पूछा कि, 'तुमलोगों ने मेरे पिता का क्या किया?" तो इस पर उन सभों ने यों जवाब दिया कि, 'उन्हें हमलोगों ने गंगा में बहा दिया।' यह सुनते ही मैं उसी जगह चक्कर खाकर गिर गई, पर जग मुझे होश हुआ, तो मैंने अपने तई अपने घर में एक चारपाई पर पड़े हुए पाया! यह देख कर मैं उठ बैठी। इतने ही में मेरी कोठरी में मेरा परोसी हिरवा नाऊ माया और वह मुझसे बुरी-बुरी बातें कह कर वाहियात छेड़छड़ करने लगा। उसकी ऐसी ढिठाई देख कर मैं जल-भुन कर खाक होगई और उसे अपने यहांसे चलेजाने के लिये बार-बार कहगे लगी। लेकिन इतने पर भी जब वह न माना और जादे हाथ-पैर बढ़ाने लगा, तब तो मैं मारे गुस्से के आपे से बाहर होगई और उसे धरसी में पटक कर उसकी छाती पर चढ़ बैठी। इसके बाद फिर तो मैने ऐसे