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सात खून।


हुआ और परमेश्वर में मेरी उतनी दुर्दशा नहीं होने दी।

तो फिर क्या हुआ? सुनिए,कहती है। नौ बजते-बजते, अर्थ मैं सब कामों से निश्चिन्त होगई, तथ कोतवाल साहब में मुझे उस सांसत-घर से निकाला मोर मेरे दोनों हाथों को मिला कर हथकड़ी भर दी। इसके बाद ये मुझे अपने साथ ले चले। मैं सिर नीचा किए हुई उनके साथ बली चौर कोतवाली के फाटफ से बाहर निकल कर एक किराए की पास की गाड़ी पर सवार कराई गई। सामने की गद्दी पर कोतवाल साहब बैठ गए और उसके सामने वाली बैठक पर उनका इशारा पाकर मैं पैठ गई। बाहर पीछे की तरफ दो कांस्टेबिल खड़े होगए और एफ तीहारा कोतवाल के बगल में जा बैठा । इस ठाठ से मैं कचहरी फसी, पर इस समय मैने अपनी मांखें नीची कर ली थी।

जब यह गाड़ी कुछ दूर निकल गई, तब कोतमाल साहब ने मुझसे यों कहा,-"दुलारी, तुम जरा मेरी तरफ देखो मोर को कुछ मैं तुमसे कहता हूँ, उसे खूब और के साथ सुनो।"

यह सुन कर मैंने कहा,--" सुनिए, साहब! आपकी तरफ देखने की मैं कोई जरूरत नहीं समझती। इसलिये आपको जो कुछ कहना हो, उसे आप कह डालिए, क्योंकि मेरे काम आपको बातें मजे मैं सुन सकते हैं।"

यह सुन कर उन्होंने जरा कुढ़ कर यों कहा,--"आह, तुमने मेरे कहने का दूसरा मतलब समझा! लेकिन मेरा बह मकसद हर्मिज नहीं था; कयोंकि तुम्हारे बराबर की तो मेरी कई लड़कियां हैं! मगर खैर, अब तुमसे मुझे सिर्फ इतना हा कहना है कि जिस कागज पर मैं तुम्हारे अंगूठे का निशान करा लिया था, इस पर इस खून के बारे में कुछ किया गया है। वह कागज आज मैं मजिस्ट्रेट के मागे पेश करूंगा । बस, तुमसे मुझे अब इतना ही कहना है कि उस कागज में जो कुछ लिया गया है, उसे तुम मंजूर कर लेना