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खूनी औरत का


अठारहवां परिच्छेद ।

कोतवाल।

"कामक्रोधमदास्थैर्यलोभमोहविवर्जिताः।
नियोज्या जनरक्षार्थ नृपेण सुजमा जनाः॥

(व्यास)
 

वे तो यों अपनी चाकरी खजाने लगे और मैं बैठी बैठी अपने खयालों के साथ लड़ने-झगड़ने लगी! कई घटे तक लगातार अच्छी तरह सो लेने के कारण फिर मुझे पिछली रात तक नींद न आई और मैं अपने तरह तरह के उधेड़-बुन में उलझी रही । फिर रघुनाथसिंह से मेरी कोई बातचीत नहीं हुई और जय तीन बजने के बाद ये पहरा बदला कर चले गए, तब मैं भी लेट ही और थोड़ी ही देर में फिर सो गई ।

वह दिन और रात तो यों ही बीते, और दूसरा दिन आया ! इस ( दूसरे ) दिन, जब मैं अपने मामूली कामों से निश्चिन्त होगई, सब यही दरोगाजी आकर मुझे कोतवालसाहब के एक निराले कमरे में लेगए । वहां जाकर मैने क्या देखा फि, 'एफ सख्तेपोश के ऊपर तीन-चार मुन्शी खाता खोले हुए बैठे हैं और कोतवालसाहब दो-तोन न तकिये बगल में दगाए हुए हुक्का गुड़गुड़ा रहे हैं !'

मेरे जाते ही उन्होंने मेरी ओर देखकर यों कहा,-'क्यों दुलारी ! ये सात खून तुम्हारे ही किए हुए हैं न ? "

मैने यों कहा,--"नहीं, साहब ! इन खूनों के बारे में जो कुछ सच्ची बात थी, यह मैं गङ्गरेज अफसर के सामने लिखा चुकी हूँ और उसे आपही लिख भी चुके हैं।

मेरी बात सुनकर वे फिर यो कहने लगे,--"सुनो, दुलारी ! मैं तुम्हारी बिहतरी के लिये तुमसे यह कहता हूं कि अगर तुम इन सातो खूनों का करना कबूल कर लोगी, तो मैं तुम्हें मजिष्ट्रट से