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खग्रास

"नहीं है प्रोफेसर, मैंने भली भॉति देख लिया। निश्चय ही अरबो बरस हो गए होगे कि तब पृथ्वी की भॉति ही चन्द्र के चारो ओर वायुमण्डल था और उस समय वही प्राणी रहते थे। उनकी सभ्यता भी बहुत ऊँची थी। इस बात के प्रमाण मुझे यहाँ प्रत्यक्ष मिल रहे है। मैंने बहुत वस्तु संग्रह की है जो संग्रह के योग्य नहीं है, उनके चित्र ले लिए है।"

प्रोफेसर ने सब बाते सुनकर कहा---मैं समझता हू कि ज्वालामुखी पर्वतो के निरन्तर विस्फोट और सूर्य के निरन्तर असह्य ताप के कारण चन्द्रलोक जैसा क्षुद्र उपग्रह अपना वायुमण्डल खो बैठा है।"

"यही बात है प्रोफेसर, हमे पत्थर पर बनी कुछ हड्डियो के नमूने मिले है। मैने उनका संग्रह किया है। ये प्राणी विचित्र रहे होगे। अत्यधिक लम्बे किन्तु अत्यन्त दुबले पतले और हलके। मेरा तो अनुमान है कि वे अन्तरिक्ष मे उड़ सकते भी होंगे। सम्भवत इनके आठ या छः हाथ पैर थे।"

"किन्तु क्या वे अस्थि कैल्शियम-फास्फेट की ही थी जैसी पृथ्वी के जीवो की होती है?" लिज़ा ने जिज्ञासा से पूछा।

जोरोवस्की ने कहा---"न, न, ये हड्डियाँ निश्चय ही सिलिका से मिलती जुलती किसी लचीली पदार्थ से बनी हुई थी और इसी से कहा जा सकता है कि चन्द्रलोक के प्राणी भूमि पर सीधे खड़े नही रह सकते होगे, न हमारी भॉति चल फिर सकते होगे। वे निश्चय ही तिरछे उड़ते होगे। इसके अतिरिक्त और एक बात की सम्भावना है।"

"वह क्या?"

"चन्द्रलोक के निवासियो की मासपेशियाँ भी हड्डी के बाहर न होकर अन्दर ही रहती होगी। तथा वे विशिष्ट छिद्रो से बाहर निकलकर त्वचा और हड्डियो से सम्बन्धित रहती होगी।

"यह तो सर्वथा ही विचित्र बात है?" लिज़ा ने कहा।

खैर तो मैंने ये सब बाते विस्तार से प्रोफेसर को समझा दी थी। परन्तु प्रोफेसर अधीर हो रहे थे। वे कह रहे थे--जोरोवस्की, जब तुम यहा