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खग्रास

प्रोफेमर ने अत्यन्त व्यग्र होकर कहा—"लेकिन, लेकिन, न्यष्टि-द्रवण बडी ही दुरूह प्रतिक्रिया है डा॰ भामा।"

"बेशक। क्योकि इसमे हल्की न्यष्टियो पर एक ही घन विद्युत होने के कारण वे एक दूसरे से दूर भागती है, इसलिए, उनके द्रवण के लिए कोई प्रचण्ड शक्ति चाहिए, यही न आप कहना चाहते है, प्रोफेसर कुरशातोव?"

"यही मैं कह रहा हूँ डा॰ भामा।"

"तो देखिये, यह शक्ति प्रचण्ड गर्मी ही हो सकती है। मेरे कथन का अभिप्राय यह है कि यदि न्यष्टियो को अति प्रचण्ड तापमान पर गर्म किया जाय तो न्यष्टियो के द्रवण से विशाल शक्ति प्राप्त होगी।"

"आप ठीक कह रहे है डा॰ भामा।" यह कर प्रोफेसर कुरशातोव ने अपनी डायरी निकाल कर कुछ हिसाब लगाया, और जल्दी-जल्दी कुछ आकडे लिखे, फिर कहा—"डाक्टर भामा, इस काम के लिए पृथ्वी पर सूर्य के बराबर ताप उत्पन्न करने की आवश्यकता है। परन्तु यह कैसे हो सकता है?"

"देखिए प्रोफेसर कुरशातोव, उद्जन बम मे तो पहिले यूरेनियम के विखण्डन मे पर्याप्त ताप उत्पन्न किया जाता है जिससे उद्जन न्यष्टियो का द्रवण होता है"

"लेकिन उद्जन बम की प्रतिक्रिया तो अनियन्त्रित होती है।" प्रोफेसर अत्यन्त व्यग्रता से उठ खडे हुए।

डाक्टर भामा ने सहज शान्त स्वर मे कहा—"इसे नियन्त्रण मे रखने के लिए यह आवश्यक है कि कोई ऐसा पात्र हो जो इस प्रचण्ड ताप को सहन कर सके।"

"यही तो मुश्किल है डा॰ भामा। हमारे पास अभी तक ऐसा कोई पदार्थ नही है जो छै हजार डिग्री से अधिक ताप सह सके।"

"लेकिन आप तो दस लाख डिगरी सेटीग्रेड के बराबर ताप उत्पन्न कर चुके हैं।"