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अप्रत्याशित

सूर्यास्त और सूर्योदय का तो कोई प्रश्न ही न था, समय के अनुमान से ही रात दिन का अनुमान वे लगाते जा रहे थें। राबर्ट स्काट की स्मृति उनके मन में बसी थी। जोरोवास्की सोच रहे थें कि क्या ही अद्भुत घटना होगी यदि हम उस साहसी अभियानकर्त्ता का पता लगा सकेंगे। अब मौसम बिलकुल साफ था और वे लोग अच्छी तरह सो चुके थें। अब एक-एक प्याला गर्मागर्म ब्राण्डी युक्त कॉफी का पी लेने के बाद उनमें काफी फुरती आ गई थी।

इस बार वे शीघ्र ही उस चट्टान के निकट जा पहुंचे। थोड़े ही प्रयास से उनका स्वप्न साकार हो उठा। चट्टान के नीचे दबा लकड़ी का एक केबिन नजर आया। जो अब से पैतालीस बरस पूर्व राबर्ट एस॰ स्काट ने कैम्प इवास में स्थापित किया था। केबिन पर अवश्य ही बर्फ की एक मोटी तह जम गई थी। और उसकी शक्ल एक चट्टान की सी बन गई थी, परन्तु लकड़ी को इन पैतालीस वर्षों में कोई हानि नहीं पहुंची थी। ऐसा प्रतीत होता था जैसे केबिन बनाने वाले अभी यहाँ से गये है। वहाँ की हर एक चीज नई जैसी लग रही थी। समय का उन पर कोई प्रभाव न था। लकड़ी की पालिस और लकड़ी में ठुकी कीले वैसी ही चमक रही थी जैसे नई हो। बिस्कुट और टिन मे खाने-पीने की दूसरी चीजे भी बिल्कुल ताजा जैसी ज्यों की त्यों रखी थी। कैप्टिन स्काट का कुत्ता बर्फ में खड़े-खड़े जम गया था। वह आज से ४५ वर्ष बाद भी जैसे का तैसा खड़ा मालिक के निवास स्थान में घुस आने वालो की ओर रोष भरी नजर से देख रहा था। उसकी आँखो की ज्योति वैसी ही थी जैसी कि वह जीवित काल में थी। वह जीवित ही प्रतीत होता था।

तीनों यात्री सहमे हुए, बड़ी सावधानी से केबिन की प्रत्येक वस्तु को देख रहे थें। अब वे एक अप्रत्याशित दृश्य को देखने की आशा से धड़कते हृदयों से एक दूसरे को देख रहे थें। उनकी पोशाकें बिजली से गर्म थी और रक्त को जमाने वाले शीत की तनिक भी परवाह बिना किए वे इस आधी