पृष्ठ:कुसुमकुमारी.djvu/२२

यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।
परिच्छेद]
१३
कुसुमकुमारी।

परिच्छेद ] कुसुमकुमारी। लिये ही हथियार की ज़रूरत पड़ी थी।" बसत,(मुस्कुराकर)" मगर इतना काम तो तुम्हारी मारू आखें ही कर डालती, फिर नाहक कटार के बोझ से अपनी नाजुक कलाई को क्यों इतनी तकलीफ़ दी ?" कुसुम,--"मगर कल इन आंखों ने इतना पानी खाया था कि इनमें अभी वह काट-छांटनही आई है, इसीलिये कटार से काम लियागया।" बसंत,--"पर इसकी कोई ज़रूरत न थी, क्यों कि मैं तो खद तुम्हारे रूप पर पतंग होरहा हूं।" कुसुम,-" पर जरा जलो तो सही, तव मेरा हिया ठंडा होय." बसंत,-"हां ! इसीलिये तो कसम खिलाकर 'चोटीकट' गुलाम बना लिया! अब तो जलाओ गी ही; मगर ठहरो, अब मेरी पारी है,-सुनो, तुम भी इस बात की कसम खाओ कि जन्मभर मुझे प्यार करोगी।” यह सुनते ही कुसुम खिड़की के पास आ और गंगा में हाथ डालकर बोली,-" सुनो, प्यारे ! यद्यपि मैं रडी के अन्न से पली और अब उसकी दौलत की मालकिन बनी हूं, पर मैं डी के पेट से पैदा नहीं हुई हूं; क्यों कि मैं भी एक अच्छे घराने की लड़की हूं, जिसका पूरा-पूरा हाल मैं तुमसे फिर कहूंगी; इसलिये सुनो, यद्यपि मैंने रंडियों का सा नाचना-गाना सीखा है, पर सच जानो,-अभी तक मेरे ' पाक-दामन' में किसी गैर शख्स का हाथ नहीं लगा है। बस, आज पहिले-पहिल इस तन को तुम्हीने अपने तन से लगाया। अव जब तक दम मे दम है, सपने में भी यह तन सिवा तुम्हारे किसी और शखस के कलेजे से न लगेगा।" उसकी बातों से वसंतकुमार के अचरज का कोई ठिकाना न रहा और उसने ताज्जुब से कहा,-" प्यारी कुसुम! वेश्या-कुल में तुम देवी की मांति पूजी जाने योग्य हो।" कुसुम,-" पर यह तो तुमने मुझे ही नहीं, बल्कि जिस कुल में मैं पैदा हुई हूं, उसे भी बड़ी भारी गाली दी ! प्यारे ! मैं वेश्या के घर पली तो बेशक हूं, मगर वेश्या-कुल में जन्मी नहीं हूं।" बसत ने लज्जित होकर कहा,- प्यारी! क्षमा करो; क्यों कि तुम्हारे मुखडे को देखकर इस समय मैं अपने आप में नहीं हूं।"