पृष्ठ:कुसुमकुमारी.djvu/१४८

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गरिच्छेद) कुसुमकुमारी हा उन लोगो ने यह वगिन, निन्ध, हेय, पापमय और शोचनीय "देवदासी-प्रथा" को धर्म के आवरण में हककर चला ही तो दिया, और धर्मप्राण, किन्तु अपरिणामदर्शी भोले आदमियों ने उस प्रथा को ग्रहण कर अपनी पुत्रियो को देवताओं की भेंट करना प्रारम्भ कर दिया ! परन्तु इन बान र आजतक किनीने भी ध्यान न दिया कि, 'जो कन्याएं देवताओं के अर्पण की जाती है, उनका चरित्र कैसा होजाता है, उनका परिणाम क्या हाना है और वे किम शोचनीय दशा का प्राप्त होकर या क्या कुकर्म करने ला जाती हैं। कुसुम को इन विचित्र बातो का बहुत ही गदा अमर राजा कणसिह के चित्त पर पड़ा. वे दर तक सिर झुकाए हुए कुसुम की सच्ची और शुद्ध-तक-मयी बातों पर विचार करने रहें । इसक अनन्तर उन्होंने कहा, "कुसुमकुमारी : तुम्हारा यह नर्क नां बहुत ही सच्चा प्रतीत होरहा है." कुलुम ने कहा,- हो होगा, क्योकि मैं जो कुछ कह रही हूं, यह अक्षर-अक्षर सत्य है। और भी सुनिए,-गृहस्थाश्रम-त्यागियों को जल भोग-विलास के लिये स्त्रियों की आवश्यकता हुई और उनका काम केवल चेलियों से न चल सका, तथा परस्त्रीगमन आर वेश्यासमागम से निन्दा होने लग गई, तब उन्होंने इस धणित "देवदासी-प्रथा" की चाल चलाकर और माले-माले धर्म- प्राण लोगों को उगकर अपने काम चलाने का उपाय निकाला! अब आरही सोचें कि इस "देवदासी प्रथा से कै-कोटि भारत की सती साध्वी कुमारियों का आज नक सवनाश हुआ हागा: क्या स पातक का फल इस देश के लोगों को न सोगना पड़ेगा, और क्या ऐसे पापों के कारण यह देश रसातल को चला जायगा! और सुनिये, इन कुनारियों मे, जो कि देवताओं के नाम विसर्जित की जाती थी, कदाचित् सौ में कोई दो ही मार एसी होती होंगी, जो इन देवसेवक लम्पटों से अपने चरित्र को रक्षा करने में समर्थ हानी होगी . इन कुमारियों में संजो अकालमृत्यु ले बच जानी थी, उनमे बहुतरी तो जन गृहस्थाश्रम त्यागी महात्माओं की भोग्या बनती थी-मोर बहुतेरी,या तास्वयम्, गाकिनी के चक्र में पड़कर वश्यावृत्ति का अवलम्बन करती थीं ' आज दिन भा देवताओं के