पृष्ठ:कुछ विचार - भाग १.djvu/११३

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अंग्रेज़ी माध्यम ज़रूरी है, यह हमारे विद्वानों की राय है। जापान और चीन और ईरान में तो शिक्षा का माध्यम अंग्रेज़ी नहीं है। फिर भी वे सभ्यता की हरेक बात में हमसे कोसों आगे हैं; लेकिन अंग्रेज़ी माध्यम के बग़ैर हमारी नाव डूब जायगी। हामरे मारवाड़ी भाई हमारे धन्यवाद के पात्र हैं कि कम-से-कम जहाँ तक व्यापार में उनका संबंध है, उन्होंने क़ौमियत की रक्षा की है।

मित्रों, शायद मैं अपने विषय से बहक गया हूँ; लेकिन मेरा आशय केवल यह है कि हमें मालूम हो जाय, हमारे सामने कितना महान् काम है। यह समझ लीजिये कि जिस दिन आप अंग्रेज़ी भाषा का प्रभुत्व तोड़ देंगे और अपनी एक क़ौमी भाषा बना लेंगे, उसी दिन आपको स्वराज्य के दर्शन हो जायँगे। मुझे याद नहीं आता कि कोई भी राष्ट्र विदेशी भाषा के बल पर स्वाधीनता प्राप्त कर सका हो। राष्ट्र की बुनियाद राष्ट्र की भाषा है। नदी, पहाड़ और समुद्र राष्ट्र नहीं बनाते। भाषा ही वह बन्धन है, जो चिरकाल तक राष्ट्र को एक सूत्र में बाँधे रहती है, और उसका शीराज़ा बिखरने नहीं देती। जिस वक्त अंग्रेज़ आये, भारत की राष्ट्र-भावना लुप्त हो चुकी थी। यों कहिये कि उसमें राजनैतिक चेतना की गंध तक न रह गई थी। अंग्रेजी राज ने आकर आपको एक राष्ट्र बना दिया। आज अंग्रेज़ी राज बिदा हो जाय—और एक-न-एक दिन तो यह होना ही है—तो फिर आपका यह राष्ट्र कहाँ जायगा? क्या यह बहुत संभव नहीं है कि एक-एक प्रान्त एक-एक राज्य हो जाय और फिर वही विच्छेद शुरू हो जाय? वर्तमान दशा में तो हमारी क़ौमी चेतना को सजग और सजीव रखने के लिए अंग्रेज़ी राज को अमर रहना चाहिये। अगर हम एक राष्ट्र बनकर अपने स्वराज्य के लिये उद्योग करना चाहते हैं तो हमें राष्ट्र-भाषा का आश्रय लेना होगा और उसी राष्ट्र-भाषा के बख्तर से हम अपने राष्ट्र की रक्षा कर सकेंगे। आप उसी राष्ट्र-भाषा के भिक्षु हैं, और इस नाते आप राष्ट्र का निर्माण कर रहे हैं। सोचिये आप कितना महान् काम करने जा रहे हैं। आप क़ानूनी बाल की ख़ाल निकालनेवाले वकील नहीं बना रहे