पृष्ठ:किसान सभा के संस्मरण.djvu/७३

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लेकिन लखनऊ का 'संघर्ष' नामक साप्ताहिक हिन्दी-पत्र तो क्रांति-: कारी ही है। उसने जन सन् १९३८ में अपने अन लेख में यहाँ तक लिख मारा कि हमें किसान सभा का भी उपयोग करना चाहिये, तो मुझे . विवश होके सम्पादक महोदय को पटना में ही उलाहना देना पड़ा.और इसके लिये सख्त रंजिश जाहिर करनी पड़ी। यह अंजीब बात है कि क्रांति के अग्रदूत बनने के दावेदार कांग्रेस के मुकाविले में किसान सभा जैसी वर्ग संस्थानों को गौण मानें । उनने हजार सफाई दी। मगर मैं -मान न सका।

(६.८.४१)

आगे चलिये । कुछ महीने पूर्व एक सर्ग्युलर देखने को मिला था। उसमें और और बातों के साथ लिखा गया है कि "आज तक किसान -सभाओं का संगठन स्वतंत्र होते हुए भी राजनीतिक क्षेत्र में वह कांग्रेस की.मददगार मात्र और उसके नीचे रही है ! यहाँ 'मददगार मात्र में मात्र' शब्द बड़े काम का है। जो लोग किसान सभात्रों को सन् १९४१ ई. के शुरू होने तक राजनीतिक बातों में कांग्रेस की सिर्फ मददगार और उसके नीचे मानते रहे हैं वही जब दावा करते हैं कि किसान सभा में जमींदारी मिटाने का प्रस्ताव पहले पहल लाने वाले वही हैं तो हम हैरत में पड़ जाते हैं । जमींदारी मिटाने की बात तो जबर्दस्त राजनीति है। कांग्रेस ने आज तक खुल के इस बात. का नाम नहीं लिया है। प्रत्युत उसका नीति-निर्धारण जिस पुरुष के हाथ में है वह तथा कांग्रेस के दिग्गज नेता एवं कर्णधार-सब के सब-जमींदारी का समर्थन ही करते हैं। गान्धी जी ने तो यहाँ तक किया कि सन् १९३४ ई० में युक्त प्रान्त के जमोदारों के प्रतिनिधि मंडल (deputation) को खुले शब्दों में कह fear at BF "Better relations between the landlords and tenants could be brought about by & change of heart on both sides. He as never, in favour of abolition of the Taluqdari or zariadari system." "Mahratta", 12. 8. 1934)