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इसीलिये अन्तर्राष्ट्रीय के सबसे बड़े पोषक एवं सूत्रधार मो॰ स्तालीन ने कई साल पूर्व एलान कर दिया कि ऐसी संस्था या पार्टी की अब जरूरत नहीं है। जिस तृतीय अन्तर्राष्ट्रीय की देखा-देखी दूसरे अन्तर्राष्ट्रीय बने, जब वही बेकार है, तो इनकी क्या जरूरत? सोशलिस्ट पार्टी, फारवर्ड ब्लाक और क्रान्तिकारी सोशलिस्ट पार्टी का तो अन्तर्राष्ट्रीय से कोई सम्बन्ध है भी नहीं। ऐसी दशा में एक कदम और नीचे उतर कर इन सभी पार्टियों को भी खत्म क्यों न कर दिया जाय? इनकी क्या जरूरत रह गई? और जब कम्युनिस्ट पार्टी का सूत्रधार तृतीय अन्तर्राष्ट्रीय न रहा, तो फिर यह पार्टी भी नाहक क्यों रहे? अगर सिर्फ बाल की खाल खींचने, वामपंक्षियों को टुकड़े-टुकड़े करने, नेतागिरी का हौसला पूरा करने और सभी वर्ग संस्थाओं में कलह और जूतापैजार ही इनका उद्देश्य हो तो बात दूसरी है। अब तो पार्टियों के भीतर भी आपस में ही लीडरी के झगड़े प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से चलने लगे हैं।

क्रान्तिकारी राजनीति और मार्क्सवाद के यथार्थ ज्ञान और तदनुसार अमल करने की ठेकेदारी इन पार्टियों को ही मिली है, ऐसा दावा दूर की कौड़ी लाना है और बीसवीं सदी के बीच में भी दुनिया को उल्लू समझने की अनधिकार चेष्टा करना है। और अगर यही बात हो तो फिर वह ठेका किस एक पार्टी को मिला है और कैसे, कहाँ से, यह भी सवाल उठता है। क्योंकि इसी ठेकेदारी की लड़ाई तो आखिर ये आपस में भी करती ही हैं। तब फैसला कैसे हो कि फलाँ पार्टी ही के पास वह ठेका है?

किसान-सभा और मजदूर-सभा आपस में मिलकर यदि आवश्यकता समझें कि दोनों के सहयोग के लिये एक सम्मिलित समिति चाहिये तो उसका भी चुनाव दोनों की राय से हो सकता है। जैसे इन सभाओं की समितियाँ नीचे से ऊपर तक चुनाव से बनती हैं तैसे दोनों की या ऐसी ही और सभा को भी मिलाकर अनेकों की एक समिति से चुनाव से बन सकती है। उसी को पार्टी भी कहना चाहें तो भले ही कहें, मगर यह बाहर से