पृष्ठ:काश्मीर कुसुम.djvu/१९१

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शेष है और इतना बड़ा काशी का चेत्र है और यह उस को सीमा और यह मार्ग है और यह पंचक्रोश के देवता हैं । बस इतनाही कहो भगवते कालाय नमः । हमारे गुरु राजा शिवप्रसाद तो लिखते हैं कि " केवल काशी और कन्नौज में वेद ध बंच गया था" पर मैं यह कैसे कहूं बरंच यह काइ सवाता हूं कि काशो में सब नगरों से विशेष जैन मत था और यहीं के लोग दृढ़ जैनी थे भवतु काल जो न करै सब आश्चर्य है । क्या यह संभावना नहीं हो सकती कि प्राचीन कान्त में जो हिन्दुओं की मूर्तियां और मन्दिर घे उन्ही में जैनों ने अपने काल में अपनी मूर्तियां बिठा दीं?क्यों नहीं। केवम्स कुछ क्षण दिल्ली के सिंहासन पर एक हिन्दू बनियां बैठ गया था उतने ही समय में मसजिदों में हिन्दुओं ने सिन्दूर के भैरव बना दिये और कुरान पढ़ने की चौकियों पर व्यासों ने कथा बांची तो यह क्या असन्भावित है।

कर्दमेश्वर का मन्दिर बहुत ही प्राचीन है और उस्को शिखर पर बहुत से चित्र बने हैं जिन में कई एक तो हिन्दुओं के देवताओं के हैं पर अनेका ऐसे विचित्र देव और देवौ बनी हैं जिनका ध्वान हिन्दू भारत में कहीं नहीं मिलता अतएव कर्दमेश्वर महादेव जी का राज्य उस मन्दिर पर कब से हा यह निश्चय नहों और पलथों मारे हुए जो कर्दम जी को श्रीमूर्ति है वह तो निस्सन्द ह ४५ * ५५ ** कुछ और ही है और इस के निश्चय को हेतु उस मन्दिर के त्रास पास के जैन खंड प्रमाण हैं और उसो गांव में आगे कप के पास दहिने हाथ एक चौतरा है उस पर वैसी ही ठीक किसी जैनाचार्य को सति पलथी मार खंडित रक्खी है देख लीजिए और उस के लम्ब कान उस का जेनत्व प्रमाण करते हैं अब कहिए वह तो कर्दम ऋषि हैं ये कौन हैं कपिल देव जी हैं ? ऐसे हो पंचकोशी के सारे सार्ग में वरंच वाशी के पास पास को अनेक गांव में सुन्दर सुन्दर शिल्प विद्या से विरचित जैन खंड पृथ्वो के नीचे और ऊपर पड़े हैं। कर्दमेश्वर का सरोवर श्रीमती रानी भवा- नी का बनाया है और उस पर यह श्लोका लिखा है ।

"शाको गोत्र तुरंभूपतिसिते योमत्भवानोन्टपा

गौड़ाख्यानमहीमहेन्द्रवनिता निकाई में काईमं ।

कुछ ग्रावसुखंडमंडित तटं काश्यां व्यधादादरात्

योतारातनया पुरांतकपर प्रीत्य विसुत नृणां" ॥

अर्थ-शाको १६७७ में अपनी कन्या श्रीतारा देवी के स्पर्णार्थ यह कर्दन