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काव्य में रहस्यवाद

वाली चमक के पीछे संध्या की मधुर आभा मृदुलता का संकेत करती है । हाँ! 'अन्धकार' या 'अँधेरी रात शोक और उदासी का प्रतीक अवश्य मानी जाती है। जायसी ने रत्नसेन के परलोकवास पर अँधेरी रात ही ली है-

सूरुज छपा, रैनि होइ गई । पूनिउँ ससि सो अमावस भई ।

यहाँ पर यह कह देना आवश्यक है कि प्रतीकों का व्यवहार हमारे यहाँ के काव्य में बहुत कुछ अलंकार-प्रणाली के भीतर ही हुआ है । पर इसका मतलब यह नहीं है कि उपमा, रूपक, उप्रेक्षा इत्यादि के उपमान और प्रतीक एक ही वस्तु हैं। प्रतीक का आधार साहश्य या साधर्म्य नहीं, बल्कि भावना जाग्रत करने की निहित शक्ति है । पर अलंकार में उपमान का आधार सादृश्य या साधर्म्य ही माना जाता है। अतः सब उपमान प्रतीक नहीं होते । पर जो प्रतीक भी होते हैं वे कान्य की बहुत अच्छी सिद्धि करते हैं। अलंकारो में कभी-कभी किसी एक विपय के साश्य या साधर्म्य के विचार से ही बहुत से उपमान ऐसे रख दिए जाते हैं जिनमें कुछ भी प्रतीकत्व नहीं होता-जैसे कटि की उपमा के लिए सिंह या भिड़ की कमर । ऐसे उपमानो से हम सच्चे काव्य की कुछ भी सिद्धि नहीं मानते। किसी वस्तु के मेल में उपमान खड़ा करने का उद्देश्य यही होता है कि उस वस्तु के सौन्दर्य्य आदि की जो भावना हो उसे और उत्कर्ष प्राप्त हो। अतः सच्ची परखवाले कवि अप्रस्तुत या उपमान के रूप में जो वस्तुएँ लाते हैं उनमें प्रतीकत्व होता है। हंस, चातक, मेघ, सागर, दीपक,