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काव्य में रहस्यवाद

"अभिव्यंजना ही कला या काव्य है" इसका अर्थ यहाॅ तक कभी नहीं घसीटा जा सकता कि व्यंजना या व्यंजक उक्ति से भिन्न काव्यानुभूति कोई वस्तु ही नहीं। काव्यानुभूति ही वह प्रधान वृत्ति है जो व्यंजना की प्रेरणा करती है। बात यह है कि पाठक या श्रोता के पास कवि की अन्तर्वृत्ति तक पहुॅचने का कोई अचूक साधन नहीं होता जिससे वह यह देख सके कि अनुभूति के अनुरूप व्यंजना हुई है या नहीं। इससे वह व्यंजना या उक्ति से ही प्रयोजन रखता है। पर जब हम पूरे कवि-कर्म पर विचार करते हैं -- केवल उसके फल पर ही नहीं -- तब उसके मूल में काव्यानु भूति की सत्ता माननी पड़ती है। यह दिव्य अनुभूति समय-समय पर थोड़ी-बहुत सबको हुआ करती है। इसका प्रधान लक्षण है अपने खास सुख-दुःख, हानि-लाभ आदि से उत्पन्न न होना, अपनी शरीर यात्रा से सम्बद्ध न होना। प्रेमियो के प्रेम-व्यापार, दुखियों के दुःख, अत्याचारियों की क्रूरता देख-सुनकर जो रति, करुणा और क्रोध जाग्रत होता है; छूटे हुए स्वदेश की, अतीत काल के दृश्यो की जो प्रीतिस्निग्ध स्मृति जाग्रत होती है, लोक रक्षक और लोकरंजक महात्माओ के प्रति जिस श्रद्धा-भक्ति का उदय होता है, उन सबकी अनुभूति शुद्ध भावक्षेत्र की अनुभूति है। जब तक इस प्रकार की अनुभूति में कोई लीन रहे, तब तक उसपर अव्यक्त काव्य का आवेश समझना चाहिए।

रसानुभूति या काव्यानुभूति की उपर्युक्त विशेषता के कारण उसे लोकोत्तर, जीवन से परे आदि कहने की चाल चल पड़ी है।