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काव्य में रहस्यवाद


नहीं। अँगरेज़ी साहित्य का थोड़ा परिचय रखनेवाला भी जानता है कि कीट्स प्राचीन यूनानी काव्य का आदर्श लेकर नए ढंग (Romantic) पर चले हैं जिसमे रहस्यवाद की गंध तक नहीं। यह दिखाया जा चुका है कि जिसमें रहस्यवाद की उत्पत्ति पैग़- म्बरी (Semitic) मतों के भीतर हुई है। प्राचीन आर्य्य-काव्य मे -- क्या भारत के, क्या योरप के -- रहस्यवाद का नाम तक नहीं, सीधा देववाद है। कीट्स की कल्पना बहुत ही तत्पर थी इससे उनमें मूर्त विधान (Imagery) का विलक्षण प्राचुर्य्य है। वे अपने इन्द्रियार्थवाद (Sensualism) के लिए प्रसिद्ध हैं; रहस्यवाद के साथ तो उनका नाम कहीं लिया ही नहीं जाता। कहीं ईट्स के धोखे में उनका नाम न आ जाता हो?

एक दूसरी कोटि के कवि भी होते हैं जिन्हे कभी-कभी भ्रान्तिवश कुछ लोग रहस्यवादी कह दिया करते हैं। अँगरेज़ी कवि ब्राउनिंग (R. Browning) इसी तरह के कवि थे। उनकी कविता में बुद्धि-व्यापार का बहुत योग है। विचारों की ऐसी सघनता बहुत कम कवियों में पाई जाती है। कहीं-कहीं विचारों की गति इतनी क्षिप्र होती है कि पाठक साथ-साथ नहीं चल पाता और उसे दुर्बोधता या अस्पष्टता का अनुभव होता है। कहीं-कहीं इसी प्रकार की अस्पष्टता की प्रतीति के कारण स्थूल दृष्टि से देखनेवालों को रहस्यवाद का धोखा होता है। पर ब्राउनिंग की अस्पष्टता में और रहस्यवादी की बनावटी अस्पष्टता में कौड़ी-मुहर का फर्क है। दोनो की उत्पत्ति सर्वथा भिन्न कारणों से