पृष्ठ:काव्य दर्पण.djvu/५९

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दर्शन-विज्ञान है । आसोपलब्ध का क्षेत्र इतिहास है। कल्पित अथं का प्रधान क्षेत्र काब्य है। पर भाव या चमत्कार समन्वित होकर ये तीनों प्रकार के अर्थ काव्य के आधार हो सकते है और होते हैं।" किन्तु, इनके अतिरिक्त भी उपमित और अर्थापन्न अर्थ होते हैं। उपमित का अर्थ है एक सदृश दूसरा । सभी काव्य-प्रेमी काव्य मे सदृश अर्थ की व्यापकता को मानते हैं । बहुत-से अलंकारों को जड़ तो यह सादृश्य-मूलक उपमित अर्थ हो है । अर्थापन्न अर्थ भो काव्य मे आता है। अर्थापन्न का अर्थ होता है श्रा पड़ा हुआ अर्थ । अर्थापत्ति अल कार का मूल यही अथं है। ध्वनिकार ने कहा है कि "अङ्गना के सुगठित अगों में जैसे लावण्य-सौष्ठव, कान्ति, चमक-दमक, एक अतिरिक्त पदार्थ है वैसे ही कवियों की वाणी में एक ऐसी कोई वस्तु होती है जो शब्द, अर्थ, रचना-वैचित्र्य आदि से अलग प्रतीयमान होती है।" बेडेल साहब भी यही बात कहते हैं ....."किन्तु इनको (शब्दानुक्त वस्तु की ) व्यंजना अनेक कविताओं मे, भले ही सब कविताओं में न हो, विद्यमान रहती है । इसी व्यंजना में, इसी अर्थ में काव्य-सम्पत्ति का एक श्रेष्ठ अंश निहित -रहता है । यह एक भावात्मा है या ध्वन्यात्मा ।"२ यह तो काव्य को प्रात्मा ध्वनि है-'काव्यस्यात्मा निः' ही कहना है । ___ काव्य में जितना ही अर्थ व्यजित होगा उतनी ही उसको सम्पत्ति बढ़ेगी। यद्यपि अर्थावगम अर्थकर्ता के बुद्धि-वैभव पर निर्भर करता है तथापि महाकवियों की वाणी से अर्थ का उत्स फूटा पड़ता है और एक-एक वाक्यांश के अनेकानेक अर्थ किये जा सकते है। साहित्य "एक हूँ बहुत हो जाऊँ'3 इस प्रकार परमात्मा की इच्छा से सृष्टि का समारंभ हुआ है। आदि मानव ने संसार की अपूर्व झांकी देखी। उसपर वह मुग्ध था। पर मूक था-अवाक् था। परस्पर इगितों-संकेतो से काम चलाने लगा ; किन्तु इससे मन के भाव स्पष्ट हो नहीं पाते थे। अचानक उच्छ वसित हृदय से उठी हुई ध्वनि कंठ से फूट निकली । क्रमशः उसमें स्पष्टता आयो । १. प्रतीयमानं पुनरन्यदेव वस्त्वस्ति वाणीषु महाकविनाम् । यत्तत्प्रसिद्धावययातिरिक्त विभाति लावण्यमिवांगनासु ॥ ध्वन्यालोक २. ........but the suggestion of it in much poetry, if not all, .and poetry has in this suggestion, this 'meaning agreat of its