पृष्ठ:काव्य दर्पण.djvu/४४६

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अनुप्रास ३६५ जैसा उनके क्षुब्ध हृदय में धड़ धड़ धड़ था। वैसा ही उस वाजि-वेग में पड़ पड़ पड़ था। फड़ फड़ करने लगे जाग पेड़ों पर पक्षी अपलक था आकाश चपल वल्गित-गति-लक्षी।-गुप्त ३. जहाँ माधुयं, रोज गुणवाले वर्षों से भिन्न प्रसाद गुणवाले वर्ण हो वहाँ कोमला वृत्ति होती है । इसका उपयोग शृङ्गार, शान्त और अद्भुत रस में होता है । (क) नव-नव सुमनों से चुनकर धूलि सुरमि मधुरस हिमकण मेरे उर की मृदु कलिका में भर दे कर वे विकसित मन ।-पंत (ख) जोन्ह ते खाली छपाकर भी छन में छनदा अब चाहत चाली । कूजि उठी चटकाली चहूं दिशि फैल गयी नम ऊपर लाली । साली वियोग बिथा उर में निपटै निठुराई गहे वनमाली। आली कहा कहिये कवि 'तोष' कहूँ प्रिय प्रीति नयी प्रतिपाली । (३) श्रुत्यानुप्रास वहाँ होता है जो कएठ, तालु आदि किसी एक ही स्थान से उच्चरित होनेवाले वर्षों में समानता पायी जाय । किस तपोवन से किस काल में सच बता मुरली कल नादिनी, अवनि में तुझको इतनी मिली मधुरता, मृदुता, मनोहारिता। हरिऔध अन्तिम चरण में दन्त्य वर्णों को समता है। शांक न झंझा के झोंके में झुक कर खुले झरोखे से।-गुप्त झंकार का तालुस्थान होने से यह श्रुत्यानुप्रास है । (४) लाटानुप्रास वहाँ होता है जहाँ शब्द और अर्थ की आवृत्ति में अभिप्राय मात्र को भिन्नता होती है। काल करत कलिकाल में नहीं तुरकन को काल । काल करत तुरकन को सिव सरजा करबाल ।-भूषण इसमें 'काल करत' शब्दार्थ को प्रावृत्ति है । तात्पर्य मे भेद है । पराधीन को है नहीं स्वाभिमान सुख स्वप्न । ___- पराधीन जो है नहीं स्वाभिमान सुख स्वप्न । . पराधीन व्यक्ति को स्वाभिमान का सुख-स्वप्न नहीं है और स्वतत्र व्यक्ति को, जो पराधीन नहीं है, स्वाभिमान का सुख-स्वप्न है अर्थात् उसका सुख उसे प्राप्त है। यहाँ वाक्यवृत्ति में तात्पर्य का भेद है । (५) छन्द के अन्त में जब अनुप्रास होता है तब अन्त्यानुप्रास कहलाता है।