पृष्ठ:काव्य दर्पण.djvu/४१८

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काव्यदर्पण गौड़ी श्रोजःप्रकाशक वर्षों से आडम्बर-पूर्ण बन्ध को-रचना को-गौड़ी रीति वा पुरुष वृत्ति कहते हैं। १ गूजे जयध्वनि से आसमान-सब मानव मानव है समान । निज कोशल मति इच्छानुकूल, सब कर्म निरत हों भेद भूल, बन्धुत्व-भाव ही विश्व मूल सब एक राष्ट्र के उपादान ।-पंत रचना भोजापूर्ण है। पांचाली दोनों रीतियों के अतिरिक्त वर्णों से युक्त पंचम वर्णवाली रचना को पांचाली रोति वा कोमला वृत्ति कहते हैं। १ इस अभिमानी अंचल में फिर अंकित कर दो विधि अकलंक, ___ मेरा छीना बालापन फिर करुण लगा दो मेरे अंक ।-पंत २ देकर निज गुजार गन्ध मृदु मंद पवन को चढ़ शिविका पर गई माण्डवो राज-भवन को।-गुप्त इनको रचना कोमल है। वैदर्भी और पांचाली की रीति के बीच की रचना को लाटो कहते हैं। आचार्यों का यह मत है कि वक्ता आदि के औचित्य से इनके विपरीत भी रचना हो सकती है। गुण तथा रीति का विचार हिन्दी की आधुनिक रचनाओं के विचार से होना चाहिये। संस्कृत को ये रूढ़ियाँ नियमतः नहीं, सामान्यतः लागू हो सकती हैं। इसमें सन्देह नहीं कि इनके आधार पर श्रेणी-विभाग हो तो इनकी वैज्ञानिकता नष्ट नहीं होने पावेगी। व्यक्ति-विशेष की शैली श्रेणी-विभाग का एक विशिष्ट उपादान होगी। तथापि गुण-रोति का ज्ञान काव्य-कला के अंतरग में पैठने का द्वार है। इनकी उपेक्षा नहीं की जा सकती।