पृष्ठ:काव्य दर्पण.djvu/३५३

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अर्थानुसार काव्य के मैद २६६ व्यंग्य की अपेक्षा नहीं रखकर उपमा के चमत्कार पर ही कवि का ध्यान केन्द्रित है। इसीलिए यह अर्थ-चित्र है। यहाँ उपमा से वस्तु धनित होने की संभावना रहते हुए भी वह लक्ष्य नहीं है। विप्र-कोप है और्व, जगत जलनिधि का जल है। विप्रकोप है गरल वृक्ष क्षय उसका फल है। विप्र-कोप है अनल जगत यह तृण-समूह है। विप्र-कोप है सूर्य जगत यह घक-व्यूह है। -रा० च० उ० परशुराम के प्रति श्री रामचन्द्र की यह उक्ति है। इस पद्य में रूपक को बहुलता-कवि की उनी विषय पर एकाग्रता-रसादि ध्वनि की भावना को बहुत पीछे छोड़ देती है। अर्थ-चमस्कार की विशेषता इसे शब्द-चित्र से ऊपर उठा देती है। वाच्य-चमत्कार-युक्त शब्दालंकार काव्य जहाँ ध्वनि आदि का लेश भी अपेक्षित न रहें और अर्थ में थोड़ा- बहुत चमत्कार लिये शब्दों में अलंकार हो, वहाँ कान्य का चतुर्थ भेद होता है। तो पर बारों उरबसी, सुन राधिके सुजान। तू मोहन के उर बसी, खै उरबसी समान ॥-विहारी प्रस्तुत पद्य में प्रथम उरबशी का एक भूषण-विशेष, द्वितीय का हृदय में बसमा और तृतीय का अप्सरा अर्थ होता है। इन पदो के अर्थ में सर्वथ चमत्कार का प्रभाव नहीं है। इनमें उपमा के मधुर भाव का थोड़ा-बहुत अंश अवश्य है। इसीसे यहां काव्य का व्यवहार है। लोक लीक मीक लाज ललित से नहलाल लोचन ललित लोल लीला के निकेत हैं। सोहन को सोचना संकोच लोक लोकन को देत मुख शाको सखी, पूनो सुखदेत हैं। किशोदास' कान्हर के नेहरी के कोर कसे अंग रंग राते रंग अंग अति सेत है। देखी देखी हरि की हरनता हरननैनी देख्यो नहीं देखत ही हियो हरि खेत है।