पृष्ठ:काव्य-निर्णय.djvu/६४७

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६१२ काव्य-निर्णय चाहिये । अस्तु, दोंनों दलों के सम-अक्षर-दूसरा, चौथा, छठवां, आठवां, दसवां, बारहवां, चौदहवां और सोलहवां अक्षर जैसे मध्य के कोष्ठक में-स', रु", त", इ८, इ.", है१२, म", बि और खि" "एक होने चाहिये । जिससे ऊपर दिये चित्र की भांति दोनों दलों में लग सके।" दुतिय त्रिपदी जथा- जहाँ-जहाँ प्यारे फिरें, धरे हाथ धुनु बाँन । तहाँ तहाँ तारे' घिरें, करें साथ' मँनु प्रान॥ अस्य उदाहरन वि०-"इस त्रिपदी के उदाहरन में भी वही बात है। यहाँ भी-दूसरा, चौथा, छठवां, अाठवां, दसवां, बारहवाँ, चौदहवां और सोलहवां अक्षर- हाँ, हाँ, रे, रे, रे, थ, नु, न जैसा अंकों से ज्ञात होता है एक हैं और वे दोनों दलों के निर्माण में लगते हैं ।" अथ मंत्र-गति चित्रालंकार- जहाँ-जहाँ प्यारे फि रे,धरे हाथ धनु- बान । तहाँ-तहाँ तारे घिरें, करें साथ मॅनु-पान । अस्व उदाहरन - - - - - - - - -- वि०-"मंत्र-गति चित्रालंकार की चाल-बनावट टेढ़ी-M इस प्रकार होती है । यहाँ प्रथम चरण का प्रथम अक्षर 'ज' और द्वितीय चरण का द्वितीय अक्षर-'हाँ' इसी प्रकार क्रम से प्रथम चरण के-एक, तीन, पांच, सात, नौ, म्यारह, वेरह और पंद्रहवें अक्षर-“ज, ज, प्या, 'फि, ध, हा, ध