पृष्ठ:काव्य-निर्णय.djvu/६३४

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१६8 काव्य-निर्णय खल छै करी सब कोउ कहें, सरजाहि की'नकहूँ बियो । पद-पद्म चारु सु ध्याइके, करि 'दास' 'मद सों हियौ ।। अस्य उदाहरन सबक है। धरियो पर सिदि सनाथ S1221 तिनीप्रियो वि०-“दासजी कृत यह पाठ श्रारात्रों का 'चक्र-बंध' चित्र-काव्य है । इन अाठों के मध्यवर्ती कोष्ठक में 'ए' अक्षर छंद-प्रयुक्त पूर्व के दो-चरणों का बार- बार और-"री, है, की, यौ, चाँ, के, छ" तथा 'यौ' चक्र के श्रारात्रों के अंतिम कोष्ठकों में जो बड़े टाइप से लिखे गये हैं दो बार प्रयोग के साधन हैं। अतएव अंक-क्रमानुसार इस ऊपर लिखे छंद को निम्न प्रकार पढ़ना चाहिये। १-(मध्यकोष्ठक के 'प' वर्ण से प्रारंभ ) 'प' रमेश्वरी', २-'प'रसिद्ध 'है', ३-'प'-सुनाथ 'की', ४-'पतिनी प्रि-यो', ५- 'प'रचंड 'चाँ', ६- 'प' चढ़ाइ-'के', ७-'प'रसेन' छै, ८-'प'-ल में कि 'यौ',६-खल छै 'कारी सब कोउ क हैं', सरजाहि 'की' न कहूँ बि-यौ' । १०-पद-पद्म 'चारु सु ध्याइ 'के', करि दास 'छै मद सों हि-यो' इत्यादि ।" अथ दुतिय चक्र-बंध चित्रालंकार जथा- कर-नराच धुनु धरन. नरक दारुनों निरंजन। जदु-कुल-सरसिज-भाँन, नईरित' नगरौ गंजन ॥ पा०-१. (का०) को...। २ (का०) छे म दसौ हियो। (३०) म भस्थौ...! (स'. पु० प्र०) बैम-धरयो.... ३. (का०) (३०) (प्र०) नैरित्य-नहरित नगारी गंज...