पृष्ठ:काव्य-निर्णय.djvu/६१९

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५८४ काव्य-निर्णय वाला कोन, गृह को सुखद करने वाला कोन, गुमान किस को पाकर बढ़ता है और वह किस कारण घट जाता है, संसार में स्थिर क्या रहता है, शुभ जन्म क्या-या किसका, श्रीवृषभान की राधिका कोंन थीं, घड़ियाँ कितनी और किसे पूजना है-इत्यादि प्रश्नों के उत्तर "नगराज-सुती" के दो-दो अक्षरों को उलट-पलट कर जैसे-नग (रत्न), गन (समूह), गरा (गला), राग (प्रेम), राज (ऐश्वर्य), जरा (वृद्धवस्था), जसु (यश), सुज (अच्छे-अाचरण वाला), सुती- (पुत्री), तीसु ( संख्या-३०) और नगराज-सुती= पर्वतराज की कन्या पार्वती (नग= पर्वत, राज = मुख्य, सुती = पुत्री) से दिया गया है ।" दुतिय सृखला-बंध को लच्छन जथा- पैहली' गति चलि जाइए, अगति चलिअ पुनि ब्यस्त । इहौ 'सृखलोत्तर' गनों, पुनि गति-अगति-समस्त ।। उदाहरन जथा- को सुघर, कहा कींनी लाज गॅनिकॉन, को पढ़या खग, मोहै। मृग कहा तपसी-बस । कहा नृप करें, कहा भू में बिस्तर, ___कहा जुबा छवि-धरै, को है 'दास'-नॉम, के हैं रस ॥ जीते कोन, कोंन अखरा को रेफ, के-कै कहा, कहें कूर मीत', राखें कहा कहें' द्यौस दस । साधु कहा गाबें, कहा कुलटा सती-सिखा. सब को उत्तर 'दास',-"जाँनकी-रचन-जस ॥" वि.-"इस स्खलोत्तर चित्रालंकार-द्वारा भी दासजी ने पूर्ववत विविध प्रश्नों का उत्तर छंद के अंतिम चरण-विभाग – “जाँनकी-रबॅन-जस" से वही वर्गों के गतागत द्वारा दिया है । जैसे- "सुधर कोंन = "जांन" (जानकार-सुनान), वेश्या ने लज्जा की १ "न की" =नहीं को, पढ़ने वाला पक्षी कोन -"कीर' =तोता, मृग किससे मोहित होते हैं-"रब = तान-गान से, तपस्वी कहाँ बसते हैं- "बन' (जंगल) में, राजा क्या करता है-'नय'न्याय, पृथ्वी पर किसका विस्तार होता है-"जस' (यश) का, युवकों की छबि किससे बढ़ती है-"स" ____ पा०-१. (का०) (३०) (प्र०) पहिले गत चलि"। २. (का०) (प्र०) मोहै कहा मृग, कहाँ तपी-बस । (३०) मोहै काहे मृग, कहा तपी-बस । ३. (३०) पोत"। ४. (३०) ० पु०प्र०) कहि"। ५. (रा० पु० प्र०) साधू"|