पृष्ठ:काव्य-निर्णय.djvu/६०९

यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।

५७४ कान्य-निर्णय श्लेष के स्थान पर वक्रोक्ति, पुनः श्लेषादि के स्वरूप, उनके भेद तथा परिभाषा विवेचन में काफी सूझ-बूझ का परिचय दिया है । यदि हम आपके विवेचना- नुसार वक्रोक्ति को लें तो वहाँ कहना होगा कि श्राप-द्वारा किया गया उसका निरूपण विशद अभिप्राय से भरा समास रूप में बहुत सुंदर है, क्योंकि वक्रोक्ति का विवेचन आचार्य भामह कुतक-श्रादि के मतानुसार गूइ-हो नहीं, अति- गूढ है, जिसे विस्तार के साथ समझना-बूझना काव्य-मर्मशों के लिये अति आवश्यक है। प्राचार्य मम्मट ऐसा नहीं मानते, वे उसे शब्दालंकार की एक झलक जैसी मानकर उसके शन्द-विच्छेदानुसार, जैसे-वक्र-उक्ति, वा उक्ति- वक्रता को शब्दालंकारों की एक चारु-चपलता मात्र ही कथन करते हैं और इस प्रकार वक्रोक्ति को वे, बिसे भामह-श्रादि प्राचार्य ने काव्य की आत्मा कह गये थे उसकी पुष्टि न कर- सूक्ष्म संकेत से-ही सही, उसे शब्दालंकारों के सीमित क्षेत्र में रख स्थान-भ्रष्ट-सा कर दिया है। आपका श्लेश-निरूपण भी कोई नया नहीं है, वह भी रुद्रट-जन्य परिभाषा का-ही रूपांतर मात्र है। यों तो रीति-काल के प्राचीन शास्त्र-ग्रंथों में 'श्लेष' सभंग-रूप से शब्दालंकारों में माना-ही गया है, फिर भी प्राचार्य रुद्रट ने कवियों को उसमें कविता करने का सुदर प्राग्रह किया है। साथ-ही उद्भट के व्याख्याता 'प्रतिहारेदुराज' ने श्लेष के प्रति अपना मत व्यक्त करते हुए कहा है-“श्लेष शब्द-श्लिष्ट हो, वा अर्थ-श्लिष्ट, है वह अर्थालंकार, क्योंकि इसमें उपमादि अलंकारों की सुंदरता को द्विगणित करने को यथेष्ट क्षमता है। संस्कृत-साहित्य-शास्त्रष्णात 'जनों की पुनरुक्तवदाभास' के प्रति यह मान्यता है कि सर्व प्रथम यह शब्दालंकार प्राचार्य श्री उदभट जन्य है और उसकी विशद परिभाषा बाद के ग्रंथ 'काव्यालंकार-सार-संग्रह' में की गयी है, यथा- "पुनरुक्ताभासमभिनवस्त्विवोभासिभिक्षरूप पदं पदम् ।" -1,, इस से स्पष्ट जाना जाता है कि पुनरुक्तवदाभास में विभिन्न रूप दो पदों की एक अर्थ की प्रतीति में ही इसकी रूप-रेखा निहित है। यद्यपि उद्भट ने उक्त सूक्ति में यह स्पष्ट नहीं किया कि यह अलंकार अर्थ का है, शन्द का है वा उभयात्मक, बाद में श्री मम्मट ने अपनी गूढ़ समीक्षा-द्वारा इसे अर्थालंकार तो नहीं शब्द और उभयालंकार माना है। यही फैसला उद्भट के व्याख्याकार श्री राजानक का भी है।" "इति श्रीसकलकलाधरकलाधरवंसावत्तस श्रीमन्महाराज कुमार श्रीवा हिंदूपति विरचिते 'कान्म-निरनए' स्लेसाविसदा- लंकार बरनन नाम विसतिमोख्खासः।" -. .-