पृष्ठ:काव्य-निर्णय.djvu/५२

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काव्य-निर्णय साथ जोड़ने से उसका अर्थ पत्ते और राजा के साथ संयुक्त करने से 'दल' का अर्थ सेना होगा।" (६) प्रसंग-ग्याँन ते 'दोहा' जथा- बाचक ते कहुँ पाईऐ, एक-हि परथ निपाट' । 'सरसुति' क्यों' कहिऐ, कहें, 'बाँनी' बैठ्यौ हाट ॥. वि०-"जब किसी प्रसंग के कारण अनेकार्थी 'वाचक' शब्द के एक अर्थ का निर्णय हो, जैसे-'बॉनी' ( वाणी) शब्द के सरस्वती आदि अर्थ होते हैं, पर यहाँ 'हाट-बाजार के प्रसंग से 'बनियाँ ही अर्थ होगा।" (७) चिन्ह (लिंग ) ते 'दोहा' जथा- मान सबद-विंग ते कहूँ, पईऐ एक हि अर्थ, । सिखी-पिच्छ ते जाँनिऐं, केकी पर समर्थ ॥ वि०-"जब संयोग के अतिरिक्त किसी अन्य संबंध से शब्द के एक अर्थ का निर्णय किया जाय और उदाहरण जैसा यहाँ दासजी ने कहा है।" (८) सामर्थ्य ते 'दोहा' जथा- 'दास' कहूँ: सॉमर्थ ते, एक अरथ ठहरात । ब्याज वृच्छ-तोयौ कहें, कुंजर जॉन्यों जात ॥ वि०-"जहां किसी पदार्थ की सामर्थ्य के कारण अनेकार्थी-अनेकार्थवाची शब्द के एक अर्थ का निर्णय किया जाय। जैसे यहाँ व्याल हाथी और सर्प दोनों को कहते हैं, पर वृक्ष तोड़ने की सामर्थ्य के कारण व्याल शब्द का अर्थ सर्प न मान हाथी ही जाना जायगा। () औचित्य ते 'दोहा' जथा- कहूँ उचित ते पाईऐ, एक अर्थ की रीति । तह पै 'द्विज' बैठ्यौ कहे, होत बिहंग प्रतीति । पा०-१. (प्र०) कहूँ लिंग ते पाईऐ, एक अर्थ को ठाट । (का० प्र०) कहूँ लिंग ते जानिएँ, एकै प्ररथ सु घाट ! २ (प्र०) सरसइ क्यों...। (का० प्र०) सरस्वती कहिऐ कहूँ.... (३०) सरस्वति को कहिऐ.... ३. (प्र०) एकै। ४. (का० प्र०) कहूँ-कहूँ...। ५. (प्र०-२) (३०) एकै भरथ सुरीति ।

  • tt+, का० प्र० (भानु), पृ०-६६, ७० ।