पृष्ठ:काव्य-निर्णय.djvu/४३९

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४०४ काव्य-निर्णय विषादन शब्द विषाद से बना है, जिसका अर्थ 'विशेष दुःख होता है। अतएव इच्छा के विरुद्ध फल के मिलने में प्रायः दुःख होता है, इसलिए इस अलकार का नामकरण अनुरूप है। विषादन भी सर्व प्रथम 'चंद्रालोक' में-ही दृष्टिगत होता है, बाद में अन्यत्र । अतएव अाप उसके जनक कहे जा सकते हैं । चंद्रालोक में इसका लक्षण है- "ईष्यमाण विरुद्धार्थ सप्राप्तिस्तु विषादनम् ।" अर्थात् , अपनो इच्छा के विरुद्ध फल की प्राति होना-विषादन है। विपादन का वर्गीकरण, पश्चात् निर्माण होने से रुद्रट और रुय्यक ने नहीं किया है। बाद में उसका वर्गीकरण वर्णनवैचित्र्य-प्रधान तथा प्रकीर्णक अल कारों को सूची में किया गया है । वह कब और कैसे, इसका पता नहीं चलता। विपादन पूर्व कथित अलकार 'प्रहर्षण' का प्रतिद्वंदी है, क्योंकि प्रहर्षण में वांछित-अर्थ की सिद्धि के द्वारा हर्ष-अधिक हर्ष प्रकट किया जाता है और यहाँ विषाद वा विपादन में "वांच्छित अर्थ के विरुद्ध लाभ के द्वारा दुःख प्रकट किया जाता है- जैसा दासजी ने इस दोहे के उत्तगर्ध में बतलाया है।" एक बात और, वह यह कि विपादन को उद्योतकार ( काव्य प्रकाश के टोका कार ) ने 'विषम' अल कार के अंतर्गत माना है । अस्तु, पंडितराज जगनाथ जी का इस विषय में कहना है कि विषम में अभोष्टार्थ के लिए उद्योग किया जाता है और विषादन में उस (अभीष्टार्थ) को इच्छा मात्र होती है, अतएव यह प्रथक है।" पुनः उदाहरन जथा- मोहँन आयौ' हुतो' सपने, मुसिकात औ' खात बिनोद सों बीरा' । सोती हुती परजंक पै हो हूँ, उठी मिलिबे कोंसु करि मॅन - धीरा ।। पा०-१. (सु. ति० )(सु० स० ) ( का० प्र०) आए...। २. ( का० ) (प्र.) (स० पु० प्र०)(भृ० नि०) (मु० ति० ) ( सु० स० ) ( का० प्र०) इहाँ...।३. (का० प्र०) से...। ४. (का० ) (३०) (प्र.) (सं० पु० प्र०) (५०नि०) (सु० नि०) (मु० स०) ( का० प्र०) वीरौ। ५. (का०) (स० पु० प्र०) (ऋ०नि०) (सु. ति०) (सु० स० ) (का० प्र० ) बैठी...! (३०) बैठौ हरे परजक में...। ६. (का० ) (३०) (प्र०) (सं० पु० प्र०) (शृ० नि०) (सु० ति०)( स०) (का० प्र०) कह के मन धीरौ ।