पृष्ठ:काव्य-निर्णय.djvu/३७५

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३४. काव्य- निय में यही विभिनता है कि वहां "प्रथम में कार्य हो जाने पर दूसरे के द्वारा उसका विघटन होता है," और द्वितीय में “दोनों एक ही उपाय वा तर्क से विपरोत. कार्य का होना प्रस्तावित किया जाता है।" अथ प्रथम "ब्याघात" को उदाहरन तथा कारी को अन्यथा हैवे ते जथा- जे जे बस्तु सँजोगनिन, होत परम सुख-दॉन । ते-ही- चाँहि बियोगनिन, होत प्रॉन की हॉन ।। पुनः उदाहरन जथा- 'दास' सपूत सपूत हो, गथ-बल होई. न होइ । इही कपूतौ की दसा, भूलि न भूलौ" कोइ ।। पुनः उदाहरन जथा- तो सुभाब भाँमिन लखें मो हिय होत सँदेह । सौतिन को रूखो करे, पिय हिय करत सनेह ।। अथ द्वितीय ब्याघात-"काहू को विरुद्ध-ही सुद्ध" को उदाहरन लोभी धन संचै करै, दारिद को डर' माँन । 'दास' वहे डर': माँनिके, दाँनि देवि है दाँन ॥ वि०-"अलंकार-रत्न में बा. ब्रजरत्नदास जी ने इस दोहे में प्रथम व्या- घात मानते हुए कहा है कि " यहाँ दारिद्रय के भय से लोभी धन संचय (बटो- रता) करता है और उसी दारिद्रय के भय से दानी उदारता पूर्वक दान करता है। लोभी इस लोक का दरिद्रता से डर कर धन-संग्रह करता है, और दानी जन्मां- तर की दरिद्रता का भय खा कर धन का दान करता है, इत्यादि..., परंतु यहाँ विरुद्धता में शुता का वर्णन होने से द्वितीय व्याघात ही है।" ____पा०-१. (रा० पु० प्र०) जो-जो...! २. (का०) (३०) (प्र०) ताही...| ३ (३०) (सं० पु० प्र०) कपूत ही । ४. (का०) (३०) (प्र०) इहै.... ५. (का०) ३०) (प्र०) भूले.... ६. (का०) (०) (प्र०) वहै.... ७. (का०) मोहि है...। (प्र०) मोहि यहै सं०...... (का०) (प्र०) करै...। (३०) भरे.... ६.(का०) (प्र०) र...। (३०) धरिद की .... १०.३०) र....