पृष्ठ:काव्य-निर्णय.djvu/२७१

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२२६ काव्य-निर्णय अधिक" के अतरिक्त "विभिन्नता" भी है। अतएव उपमेयोपमान में विभिन्नता प्रकट करने के कारण इसका नाम 'व्यतिरेक' और ब्रज-भाषानुसार 'बितरेक' अति समीचीन है । संस्कृत-अलंकाराचार्यों ने इसके चौबीस ( २४ ) भेदों का वर्णन किया है, यथा- "हेत्वोरुकावनुक्तीनां ये साम्ये निवेदिते । शब्दार्थाभ्यामथापित रिलष्ट तद्वत्रिरष्ट तत् ॥" -काव्य-प्रकाश (सं.) १०, १६० प्रथम में-"उपमेय के उत्कर्ष और उपमान के निकर्ष के कारण का कहा जाना", द्वितीय में - उपमेय के उत्कर्ष और उपमान के निकर्ष के कारण को न कहा जाना", तृतीय में-"केवल उपमान के अपकर्ष के कारणों का कहा जाना" और चौथे में--"केवल उपमेय के उत्कर्ष के कारणों का कहा जाना" - श्रादि भेदों को "शान्दी उपमा-द्वारा प्रार्थी उपमा-द्वारा" और "पाक्षिमोपमा-द्वारा" बारह भेदों को पुनः-"श्लेष-संयुक्त" और "श्लेष-रहित' द्विधा रूप से चौबीस भेद कहे गये हैं। ___श्री मम्मटाचार्य कहते हैं कि "ध्यतिरेक के हेतु - 'उपमेय-गत उत्कर्ष-निबंधन' और 'उपमान-गत उत्कर्ष निबंधन रूप से दो प्रकार के हो सकते हैं । इन दोनी हेतुत्रों का शब्दों से जहाँ उल्लेख किया जाय, वा इन हेतुत्रों में से किसी एक का अथवा बारी-बारी से दोनों का अनुल्लेख होने पर व्यतिरेक के प्रथम तीन भेद होते हैं। इस रीति से एक उक्त-हेतु वाला और तीन अनुक्त-हेतु वाले मिला कर चार भेदों की सृष्टि होती है। तदनंतर इन चारों में उपमानोपमेय भाव कहीं शब्दों से और कहीं अर्थ से तथा कहीं श्राक्षेप से सिद्ध होने पर पूर्व के चारों भेद इन पिछले तीनों भेदों में संमिलित होने के कारण व्यतिरेक- भेदों की संख्या बारह मानी गयी है। इसके बाद इन बारहो भेदों को श्लिष्टा- श्लिष्ट-शब्द-वैशिष्ट-द्वारा परिगणित करने पर इस ( व्यतिरेक) के चौबीस भेद हो जाते हैं । साहित्य-दर्पण के कर्ता श्री विश्वनाथ चक्रवर्ती कहते हैं . "व्यतिरेकः एक उक्तऽनुक्त हेती पुनस्त्रिधा। चतुर्विधोऽपि साम्पस्य बोधनाच्छन्दतोऽर्थतः ॥ मापाउच द्वादशधारोपेऽपीति निरष्टधा। प्रत्येकं स्याम्मिलिवाट वस्वारिंशविधः पुनः॥ -साहित्य-दर्पण, १०,५३,५५, इन (२४) चौबीस भेदों के अतरिक्त-"उपमान से उपमेय की हीनता में भी चौबीस और होते हैं तथा इन दोनों को संयुक्त करने पर अड़तालीस बनते हैं।'