पृष्ठ:काव्य-निर्णय.djvu/१९०

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काम्य-निर्णय १५५ अस्य तिलक नयक सों सहेट (मिलवे को स्थान) यदि राख्यो हो, सो तहाँ ( नायक कों ) भायौ ये ब्यंग कल्यौ सो वाच्यारय ही है, ताते चारू ( सुंदर ) नाहीं। वि०--"जहाँ वाच्यार्थ, व्यंग्यार्थ की अपेक्षा अधिक सुदर-चमत्कृत हो वहाँ उक्त व्यंग्य होता है। दासजी की यह उक्ति 'अनुशयाना नायिका' के प्रति है, अनुशयाना नायिका के लक्षण में रीति-शास्त्रकारों का कहना है-- "जो तिय सुरत-सँकेत में रमॅन-गमॅन अनुमाँनि । ब्याकुल होइ सु तीसरी-नुपयनों पैहचाँनि ॥" अतएव दासजी की यह उक्ति-"विहँग-सोर०" इस संस्कृत सूति का अनुवाद है, जिसे निम्न प्रकार से श्री श्राचार्य मम्मट ने अपने 'काव्य-प्रकाश' में उल्लेख किया है, यथा- "वानीरकुंगोड्डीनशकुनिकोलाहलं शृण्वत्याः । गृहकमन्यापूताया वध्वा सीदन्त्यंगानि ॥" संस्कृत की यह सूक्ति सुदर है, पर दासजी ने नायक के पास "गृहकर्म- याताया वध्वा'-गृह कार्य में अति तल्लीन होने के कारण तरुणी के वहां (संकेत स्थान) न जाने के कारण का स्पष्ट उल्लेख न कर अपनो सूक्ति में सुंदरता अधिक ही बढ़ा दी है। अनुशयाना नायिका का उदाहरण कविवर "शंभु" ने भी, जिसे भारतेंदु बाबू हरिश्चंद्र ने अपने 'मुंदरी-तिलक' में और कविवर 'मनालाल' ने अपने 'मुंदरी- सरोज' में संमिलित किया है, अधिक सुंदर है, यथा- "दूती सँकेत गई बैन को बदि, चारी पगी हरि के गुन-गाथ में। गाय-दुहावन क कहिं 'संभु', खरी खिरका जु सखींन के साथ में । केलि के कुंज बजी मुरली, बुधि गोप-यधू की बधी ब्रजनाथ में । दोहनी हाथ की हाथै रही, न रहो मन-मोहनी को मन हाथ में ॥" मथ अवर कान्य जथा-- इहि विधि मध्यम कान्य के, जॉन लेहु ब्यौहार । जितने हू सब भेद हैं, तितनी धुनि-विस्तार ।। पा०-१. (म० प्र०) तितने ह...। (३०) तितने ही ..। (प्र० मु०) तितने या में...। २. (३०) (प्र०) जितने...। (प्र०-३) जितनी...।